माँ…एक अनंत अहसास
माँ की गोद में सोया था एक ‘नन्हा-सा’ सपना,
सीने से लगाए उसे थामे थी देख रहीं तड़पना।
आँखों में था डर, पर बाँहों में था बहुत साहस,
यूं ममता की छाया में थम गया करके आहत।
वो क्षण खूब भारी, समय भी जैसे ‘ठहर’ गया,
माँ का आँचल बन कफ़न, दर्द में निखर गया।
खुद को भुलाके भी उसने बच्चे को थामे रखा,
यूं मौत के साए में प्यार का दीया जलाएँ रखा।
क्रूज के आगे ‘नि:शब्द’ धरा, गगन भी रो पड़ा,
जैसे ममता का सागर उस दिन लहू संग पड़ा।
पर हार नहीं मानी उस माँ ने अंतिम पल तक,
अपने लाल को सहेजा है उसने हलचल तक।
माँ… सिर्फ़ शब्द नहीं, एक अनंत ‘अहसाँस’ है,
तेरे त्याग के आगे हर रिश्ता कितना उदास है।
तू ढाल है, तू शक्ति है, तू ही जीवन की हैं रीत,
तेरे चरणों में झुकता है हर युग, करता हैं प्रीत।
(संदर्भ – जबलपुर, बरगी डैम से निकले माँ-बेटे के शव)
— संजय एम तराणेकर
