कविता

आपबीती

रिश्ते मजबूर है हमसे,
इसीलिए सब दूर है हमसे,
जो नादानियां नहीं की हमने
कहा उसका सुरूर है हमसे,
पलकों पर बिठाये,खिलाये,पिलाये,
वो दिखाते गुरूर है हमसे,
अन्न की कमी का अहसास
होने नहीं दिया कभी हमने,
हमी को कहते मगरूर हमसे,
कांधे पर बिठाया,पढ़ाया लिखाया,
अब उन्हें शिकवा भरपूर है हमसे,
दिल में बसे रहे रात दिन जो
पता नहीं क्यों दूर है हमसे,
जा ले ले घर जमीं और खुशियां
अब बता भी जा क्या फितूर है हमसे,
वारने ही वाला था सब कुछ
हर सितम ढाना मंजूर है हमसे,
आपबीती सुनाऊं और कितना
कहा सबने यही दस्तूर है हमसे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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