हास्य व्यंग्य

मिठाई और पेंसिल पहलवान

आधुनिक युग की तकनीकी का सहारा लेकर चोर तरह-तरह की चोरी करने में माहिर हो गए । इस बात को नजरअंदाज करना हमारी-आपकी सबसे बड़ी भूल होगी परंतु इस चोर ने कमाल का कमाल दिखा कर ” कमाल ” कर दिया । हुआ यूं कि , दयाराम जी की नाश्ते की प्लेट से मिठाई के पीस किसी ने चोरी करके ” चमत्कार ” दिखा दिया । इस चोरी को देखते हुए गौर करने लायक सबसे बड़ी बात तो यह है कि , इस वक्त किसकी चोरी नहीं हो रही है ? यह ख़ोज का विषय हो सकता है । इस प्रकार की चोरी हो जाना निश्चित रूप से साहित्य जगत की सबसे चर्चित घटना मान कर ” गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ” मान सकते है ? यह कोई मजाक वाली बात नहीं है बल्कि , हकीकत घटना है जो पिछले दिनों मेरे शहर में घट चुकी है । इसलिए आपको बता रहा हूं आपको मेरी नहीं भगवान की ” कसम ” है किसी से बताना मत क्योंकि , यह साहित्यिक क्षेत्र का आपसी का मामला है ।
किसी कार्यक्रम में नाश्ता करते समय प्लेट से मिठाई जैसी खाद्य वस्तु की चोरी हो जाए तो सोचो उस साहित्यकार के दिल पर क्या बीतेगी और वह बन्धु इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए घर से ख़ान खाकर नहीं आया था क्योंकि , समय पर वहां उपस्थित होना था । यह बात अलग है कि , उनको गोपनीय साहित्यीक

सूत्रो से मिलीं जानकारी के अनुसार वहां पर अल्पाहार की व्यवस्था है । गर्मी के मौसम में प्रचंड मात्रा में गर्मी हमें निशुल्क प्राप्त हो रही है । इस बारे में किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया करना ” सूरज ” महाराज को इस मामले में और उग्र करने जैसा हमारा कृत्य होगा । गर्मी के बदलते माहौल को आंख दिखाते हुएं एवं सूरज महाराज की दादागिरी को अनदेखा करके पुरातत्व विभाग की अंतिम धरोहर के रूप में दिखाई दे रहे वरिष्ठ साहित्यकार जों साहित्य जगत के ” एकमात्र ” मेरे शहर के साहित्यकार दयाराम जी ” गुलाब बाई ” कालोनी के अंदर गुलाब चक्कर में आयोजित ” साहित्य और दायित्व ” कार्यक्रम में जैसे तैसे पसीने से लथपथ होकर अपनी सांसों को शेयर मार्केट की तरह ऊपर नीचे करते हुए सकुशल उपस्थित हो गए । इनके साथ कई और भी साहित्यका वहां पर पहले से मौजूद थे जो इस दुखद एवं संकट की स्थिति से गुजरते हुए यहां पहुंचे । ” साहित्य और दायित्व ” के कार्यक्रम का शानदार तरीके से जानदार रूप से संपन्न हुआ । मंच पर मौजूद अतिथि तो ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुए अपने-अपने विचार रखें ही थे लेकिन , सब ने एक मत होकर गर्मी को प्राथमिक स्तर पर कोसते हुए कार्यक्रम में उपस्थित संख्या पर ध्यान में रखकर अपने-अपने मन की बात कही
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद स्वल्पाहार की उचित व्यवस्था की गई थी । कार्यक्रम में चाय पानी नाश्ते की भरपूर व्यवस्था साहित्यिक सेवक ” भगवान ” दादा के हाथ में थी । नाश्ते की प्लेट में गरमा गरम गर्मी के माहौल में गरम कचोरी के साथ समोसे जोड़ी ने आलू की पापड़ी के संग तालमेल बिठाकर मिठाई की जुगलबंदी से खुशबू प्लेट की सीमाओं को तोड़ते हुए सभी उपस्थित महानुभाव और साहित्यकारों को विचलित कर रही थी । मुंगेरी लाल के हसीन सपने की तरह कुछ बातों को और खुशबू को अपने मन में दबाते हुए नाश्ते की तरफ कुच कर रहे सभी साहित्यकारों के साथ अपने मित्र की मदद से दयाराम जी स्वल्पाहार की तरफ अपने कदमों को शनै शनै बढ़ाते हुए आनंद के सागर में डूबने लगे क्योंकि , साहित्यिक सेवक भगवान दादा से नाश्ते की प्लेट में दयाराम जी को अपना ख़ास मानते हुए कुछ ज़्यादा ही मेहरबानी करते हुए मिठाई के कुछ पीस कुछ ज्यादा रख दिए इसलिए , दयाराम जी को घर जाकर खाना खाने की कोई टेंशन नहीं थी । नाश्ते की प्लेट हाउस फूल देखकर खानें की टेंशन रफूचक्कर हो गई लेकिन , दयाराम जी का टेंशन उस समय अचानक शुगर की तरह बढ़ गया जब दयाराम जी की प्लेट से नजर हटी और दुर्घटना घटी और नाश्ते की प्लेट से मिठाई के पीस चोरी हो गए ऐसा लगा जैसे दयाराम जी की आंखों में से किसी ने ” काजल ” निकाल लिया हों ।
स्थिति और परिस्थिति को देखते हुए भगवान दादा ने भी तुरंत शासकीय आदेश की तरह आदेश देते हुए इस चोरी की पता लगाने के लिए अपने धनिष्ठा मित्र ” चालाक ” चतुर सिंह को आदेश देते हुए अपने ख़ास ” चुगलखोरों ” को मिठाई चोरी करने वाले का पता लगाने के लिए काम पर लगा दिया । अब परिणाम का इंतजार चुनाव की तरह करने लगे । आखिरकार दयाराम जी की नाश्ते की प्लेट से मिठाई के पीस किसने चोरी किए हैं ? कौन कमबख्त है वह ? जैसे ही चतुर चालाक सिंह ने चुगलखोरों को भेजा तो अपने ही बीच में रहने वाले साहित्यकार ” लखु भाई ” उर्फ पेंसिल पहलवान के नाम से आप हम सभी उनको अच्छी तरह से जानते हैं और वह हमारे बीच साहित्यीक दोस्ती रखते हैं उन्होंने ही अपना ” धोबी पछाड़ ” पहलवानी दांव लगाते हुए दयाराम जी की प्लेट से मिठाई के पीस चोरी किए चुकी नास्तापक भगवान दादा ने पेंसिल पहलवान का नाम इस चोरी में आने के बाद उनका नाम ” काले धन ” की तरह छुपाते हुए आंखों ही आंखों में इशारा करते हुए मनमोहन की तरह ” मौन ” धारण कर लिया हालांकि , वह भी एक साहित्यकार मित्र ही है । जैसे तैसे बातचीत को वहीं दफन करके दादा दयाराम जी को फिर से नाश्ते की प्लेट में मिठाई पेश की गई । दयाराम जी के आंखों में खुशी की लहर और मुंह में मिठाई को देखकर पेंसिल पहलवान के चेहरे की हवाइयां उड़ती हुई दिखाई देने लगी ‌।

— प्रकाश हेमावत

प्रकाश हेमावत

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