मौसम की चाल में टूटे हुए सपनों की आवाज़ कोई नहीं सुनता
बेरहम गर्मी झेलने के बाद और कितनी मिन्नतों के बाद हमारी मनोकामना पूर्ण हुई और अब कहना पड़ रहा है । ” आया सावन झुमके ” यह इसलिए भी कहना पड़ रहा है कि , ” पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ” मधुर संगीत के साथ यह गीत कानों में प्रवेश कर ही रहा था कि सोशल मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रिक मीडिया समाचार ने बरसात का मिज़ाज बता दिया । बरसात ने पानी की संगत में आंधी तूफान के साथ जुगलबंदी करके अपना रंग और ढंग दिखा ही दिया जिसने ” सत्यम शिवम् सुंदरम ” फिल्म वाले तबाहियों का मंजर याद दिला दिया।
बरसात के दिनों में बाढ़ आना किसी के लिए नुकसानदायक है तो किसी के लिए फायदेमंद साबित होता है । बाढ़ से पीड़ित परिवारों के लिए बाढ़ खतरनाक रूप से साबित होती है परन्तु इसे राजनीति में एक सामान्य सी बात में प्राकृतिक घटना कह सकते हैं । यह बढ़ जब आती है तो ऊपर से लेकर नीचे तक के नेता गण अपनी शासकीय ” सेना ” के साथ युद्ध स्तर पर सेवा , मदद करने में लग जाते हैं और बाढ़ में हुए नुकसान का जायजा लेकर वस्तु स्थिति का मूल्यांकन करके फिर उसका मूल्यांकन निकालकर उसमें अपना सेवा शुल्क का मूल्य अदृश्य रूप से ” जोड़कर ” ऊपर तक भेजा जाता है । जहां पर अधिक से अधिक की ” संख्या ” में बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत कोष ऊपर से ” सबसे तेज ” दौड़ाकर चला आता है । नेताजी के लिए यह बढ़ कोष जीतने तेजी से ” हाध ” मे कोष पहुंच जाता है उतनी ही ” तेजी ” से बढ़ पीड़ितों के ” हाथ ” में किसी के साथ में भी नहीं पहुंचता है । इस बाढ़ में जिसका नुकसान हुआ उसके ” हाथ ” से राहत कोष ” कोस , कोस ” दूर होकर रह जाता है और राहत लेनें वाला उस राहत को ” कोसते ” हुए अपने नुकसान को सुधारने में बिना किसी का इंतजार किए बिना ही अपने नुकसान को सुधारने के इंतजाम में लग जाते है ।
अब यह बात अलग है , बढ़ किसके लिए बाढ़ राहत बनकर आई और किसके लिए नुकसानदायक है इसलिए , मेरे मन की बात उनके मन की बात सुनने के बाद एक बात स्पष्ट रूप से निकाल कर आई कि , ऊपर वाले ( नेताजी) की लीला इतनी निराली है उसके रंग हजार दिखाई ( खाईं) पड़ते है । बस बाढ़ पीड़ीत टूटें हूएं तन , मन , धन से अपने बिखरे हुए घर के साथ कुछ बच्चे , बुड़े , जानवरों की लाश देखकर और लापता हुए अपनों को और इधर-उधर बिखरे हुए सपने खोजने में लग जाता हैं । कुछ ऊपर वाले कर्णधारों के कर-कमलों वालीं कारस्तानी के भरोसे बाढ़ से थकी हुई नज़र हैरान हैं क्योंकि राजनैतिक महत्वाकांक्षा के माहौल में अंदरूनी फजियत के रहते आखिरकार राहत कोष की राशि लेने के लिए कई जिंदगियां कागजों में उलझकर रह गई । बाढ़ से प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए राहत की इस बात पर , नेताजी की राहत भरी राजनैतिक चाल और घटना स्थल का फोटो सेशन चहूओर प्रकाशवान हों गया । मौसम की घटनाएं और धोखे भरीं चाल सच के सिवा कुछ नही है और टूटे हुए सपनों में दुख की आवाज़ कोई नहीं सुनता है ।
— प्रकाश हेमावत
