कविता

फुर्सत के पल

फुर्सत निकालना भी
एक साधना है, एक कला है।
यह समय की अधिकता नहीं,
स्वयं से मिलने की इच्छा है।
जो अपने लिए कुछ पल बचा लेते हैं,
वे धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व को
भीतर से गढ़ना सीख जाते हैं।

फुर्सत के शांत क्षणों में
मन स्वयं का आईना बन जाता है।
वहीं विचारों की धूल झड़ती है,
कमियाँ पहचान में आती हैं,
और आत्मा का मौन जीवन का
सबसे सच्चा गुरु बन जाता है।
यहीं से निखरता है मनुष्य का वास्तविक स्वरूप।

जो हर समय यह कहते रहे
कि “फुर्सत कहाँ है”,
वे अक्सर समय की भीड़ में
अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाते हैं।
जीवन उन्हें जैसे ढाल देता है,
वे वैसे ही जीते चले जाते हैं,
क्योंकि उन्होंने स्वयं को सँवारने का अवकाश ही नहीं लिया।

इसलिए व्यस्तताओं के बीच
कुछ पल अपने लिए अवश्य बचाइए।
क्योंकि संसार को जीतने से पहले
स्वयं को जीतना आवश्यक है।
याद रखिए, फुर्सत कभी मिलती नहीं, निकाली जाती है;
और जो यह कला सीख लेता है,
वह हर दिन स्वयं का एक बेहतर रूप रचता है।

— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’

डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"

ग्वालियर (म.प्र)