“एक आह” हसरतों के नाम
मैं उस दिन स्कूल में बतौर परीक्षक-इम्तिहान मौजूद था। स्कूल के हॉल में ख़ामोशी का राज़ था, सिर्फ़ क़लम के चलने की सरसराहटें सुनाई दे रही थीं। इसी दौरान मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह बार-बार इधर-उधर देख रही थी, जैसे किसी उलझन में मुब्तला हो, जैसे कुछ कहना चाह रही हो मगर अल्फाज़ उसका साथ नहीं दे रहे थे। मैं उसकी इस क़शमक़श को समझ गया और अपनी कुर्सी से उठ कर आहिस्ता-आहिस्ता उसके क़रीब पहुँच गया।
मैंने नरमी से पूछा, “क्या मसला है? क्या आपको कोई मदद चाहिए?”
जैसे ही मैंने ये अल्फाज़ कहे, उसने अपना सर उठाया। उस लम्हे मेरी आँखें उसकी तेज़ चमकती आँखों से टकरा गईं। वह एक अजीब सी मकनातीसी(चुंबकीय)क़शिश थी! मैं एक लम्हे के लिए जैसे सकते में आ गया, मेरी नज़रें उसके चेहरे के हिसार में क़ैद हो गईं। उसके हुस्न ने मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ा दी थी, दिल की धड़कनें बे-तरतीब हो गईं। मैंने बमुश्किल ख़ुद को संभाला, अपना होश हवास बहाल किया और अपनी पेशे वराना संजीदगी को बरक़रार रखते हुए दोबारा उसी सवाल को दोहराया।
वह थोड़ी देर ख़ामोश रही, उसकी पलकें झुकें और फ़िर एक मद्धम सी आवाज़ में बोली, “सर…वो कुछ कहना चाह रही थी,लेकिन उसकी जुबां शायद वो नहीं कह पा रही थी जो वो कहना चाह रही थी,खैर मैं ज्यादा देर उसके पास खड़ा नहीं रह सकता था,,
उसकी आवाज़ में एक ऐसी करबनाक सच्चाई थी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह महज़ एक हादसा था, या तक़दीर का कोई लिखा हुआ खेल? उसके चेहरे पर परेशानी के आसार थे, मगर उन आँखों की चमक अब भी मेरे अंदर एक इज़्तिराब पैदा कर रही थी। मैंने उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, मगर मुझे क्या मालूम था कि यह छोटा सा अमल एक ऐसी दास्तान की बुनियाद बन जाएगा जो कभी अपनी मंज़िल को न पा सकेगी।
इम्तिहान-गाह का माहौल अब भी पुरसुकून था, बाकी सब तलबा अपने परचों में सर झुकाए महव-ए-तहरीर थे, मगर मेरे और उसके गिर्द एक अलग ही ख़ामोश दायरा बन चुका था। मैं जब उसके क़रीब था, इतना करीब कि मुझे उसकी सांसों की थरथराहट और उसके वजूद से उठने वाली धीमी सी महक महसूस हो रही थी।
वह अब भी मुसलसल मुझे देख रही थी। मुझे मजबूरन उसके पास फिर जाना पड़ा।उसकी निगाहों में अब परेशानी कम और एक अजीब सी गहराई ज़्यादा थी। मैंने थोड़ा झुक कर, दबी हुई आवाज़ में दोबारा पूछा, “अब क्या हुआ? क्या अब भी कोई मुश्किल है?”
मेरे सवाल पर वह एक दम से हड़बड़ा गई। उसके माथे पर पसीने के चंद क़तरे चमक रहे थे। उसने अपने हाथ में पकड़ी हुई क़लम को मज़बूती से थामा, जैसे वह अपने आप को संभालने की कोशिश कर रही हो। एक लम्हे को ऐसा लगा जैसे वह कुछ कहना चाहती है, मगर अल्फाज़ उसके होंठों पर आ कर दम तोड़ रहे थे। उसकी आँखों में एक ऐसी ख़ामोश इल्तिजा थी जिसे अल्फाज़ की ज़रूरत नहीं थी।
वह कुछ पल खामोश रही, फ़िर अपनी नज़रें झुकाए और बहुत आहिस्ता से बोली, “सर… मुश्किल सवालनामा नहीं, बल्कि कुछ और है।”
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। स्कूल के कमरे में मौजूद वह सब लोग, वह मेज़ें और वह घड़ी जो टिक-टिक कर के वक्त का गुज़रना बता रही थी, सब धुंधला गए। मुझे महसूस हुआ कि यह इम्तिहान सिर्फ़ कागज़ पर लिखे हुए सवालों का नहीं, बल्कि हमारी नज़रों के दरमियान होने वाले एक ऐसे मुबाहसे का है जो शायद कभी ख़त्म न हो।
मैंने उसे गौर से देखा, उसके चेहरे पर हया और उलझन का एक हसीन इम्तिज़ाज था। मैं जानता था कि मुझे बतौर उस्ताद इस हद से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, लेकिन उसके हुस्न और उसकी आँखों की क़शिश ने मेरी तमाम तर पेशा वराना दीवारों को कमज़ोर कर दिया था।
उसके अल्फाज़ जैसे मेरे कानों में किसी धमाके की तरह गूंजे। मैं जो उसकी आँखों की गहराइयों में कोई शायराना मफहूम तलाश कर रहा था, उसे उसकी सादगी और मासूमियत ने एक दम से ज़मीन पर ला खड़ा किया। वह इतनी शिद्दत से मुझे देख रही थी, इतनी अक़ीदत से, कि मुझे लगा शायद वह कोई राज़-ए-दिल कहेगी, मगर उसने तो ज़िंदगी का एक ऐसा कड़वा सच सामने रख दिया था जिसे सुन कर मेरी पेशावाराना गैरत और दिल की कैफ़ियत के दरमियान एक जंग छिड़ गई।
मैंने उसे हैरत से देखा। उसके चेहरे पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी, बस एक उम्मीद थी—वही उम्मीद जो उसने इम्तिहान में कामयाबी के लिए रखी थी।
मैंने आहिस्तगी से उसकी मेज़ पर झुकते हुए कहा, “आप जानती हैं कि मैं क्या कर रहा हूँ? मैं आपकी शख्सियत के वकार का पास रख रहा हूँ और आप मुझसे उसूलों का सौदा करने को कह रही हैं?”आप एक स्टूडेंट हैं,
मेरे लहजे में सख़्ती थी, मगर मेरी आँखों में शायद वह कशिश अब भी बाक़ी थी जिसने उसे यह जुर्रत दी थी। वह एक लम्हे के लिए ख़ामोश रही, फ़िर उसकी आँखों में नमी सी तैर गई। उसने धीरे से कहा, “सर, आपकी आँखों में जो मैंने देखा, मुझे लगा शायद आप मेरी मजबूरी को भी समझ सकेंगे।”
उसका यह कहना कि वह मुझे देख रही थी, मेरे अंदर के उस्ताद को लरज़ा गया। मैंने ईर्दगर्द का जायज़ा लिया, सब अपने काम में मगन थे। मैंने बहुत एहतियात से उसे क़रीब से देखा और धीमी आवाज़ में बोला, अगर तुम ने वाकई पढ़ा है तो यह परची निकाल दो, और अगर नहीं पढ़ा, तो फिर… यह इम्तिहान तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक बन जाएगा।”
मैं वहाँ से हट गया, लेकिन मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मैंने उसे एक ऐसी उम्मीद दे दी थी जो ज़ाबिता-ए-अखलाक के ख़िलाफ़ थी, मगर शायद वही वह पहला क़दम था जिसने हमारी मोहब्बत की इस नामुकम्मल दास्तान की बुनियाद रखी,वह मोहब्बत जो कानून और जज़्बात के बीच कहीं खो जाने वाली थी।
मगर उसकी आँखों में झलकती वह मासूम सी मायूसी मेरे तमाम तर उसूलों पर भारी पड़ गई। मैं ख़ुद को रोक न सका, पलट कर दोबारा उसकी मेज़ के करीब जा खड़ा हुआ।
मेरी सांसें तेज़ थीं, और दिल की धड़कनें इस कमरे की ख़ामोशी को चीर रही थीं। मैंने उसके करीब झुक कर, इतनी धीमी आवाज़ में कि किसी दूसरे को कानों-कान खबर न हो, कहा,चलो कोई बात नहीं, “जल्दी से… अपनी नक़ल निकालो और परचा हल कर लो। जल्दी,मगर याद रहे, यह सिर्फ़ अभी के लिए है,ओर आखिरी भी ।मैने उससे कहा कि,
, और किसी को इसका इल्म नहीं होना चाहिए।”
यह कहते हुए मेरी अपनी आवाज़ में एक अजीब सी लर्ज़िश थी। उसके चेहरे पर एक दम से ख़ुशी की लहर दौड़ गई, उसकी चमकती आँखों में एक फ़ातिहाना मुस्कुराहट उभरी जिसने मेरे अंदर एक तूफ़ान बरपा कर दिया। उसने तेज़ी से अपने दुपट्टे में छुपाई हुई परची निकाली और अपनी उत्तर पुस्तिका के बीच रख कर लिखना शुरू कर दिया।
मैं वहाँ से हट कर दोबारा अपनी कुर्सी पर आ बैठा, मगर अब मेरी नज़रें परचे पर नहीं, बल्कि उसी पर थीं। वह कितनी लगन और इत्मीनान से लिख रही थी! उस लम्हे मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने एक तालबा को नक़ल करने की इजाज़त नहीं दी, बल्कि अपने दिल की एक ऐसी डोर काट दी है जो मुझे अख़लाक़ियात की हुदूद में बांधे हुए थी।
वह इम्तिहान तो वक़्त पर ख़त्म हो गया, सब तलबा हॉल से बाहर निकल गए, मगर मेरी रूह इसी हॉल में कहीं उलझ कर रह गई थी। मैं जानता था कि जो बीज आज मैंने बोया है, उसका फ़ल कड़वा हो सकता है, लेकिन उस वक्त मेरे दिल पर उसके हुस्न का जादू इस क़द्र हावी था कि मुझे किसी अंजाम की परवाह नहीं थी। वह ख़ामोशी बाक़ी थी जो अब उसके जाने के बाद मज़ीद गहरी हो गई थी। क्या यह एक उस्ताद की मोहब्बत थी, या महज़ एक कमज़ोरी? यह सवाल मेरे ज़हन में बार-बार गूंज रहा था…
कमरा-ए-इम्तिहान पूरी तरह ख़ामोशी छाई थी, कि अचानक हॉल के दरवाज़े से इंस्पेक्शन टीम की आमद की आहट सुनाई दी। मेरे पैरों तले से ज़मीन जैसे निकल गई। मैं जो अभी उससे कुछ दूरी पर खड़ा था, एक झटके से अपनी जगह से हटा।
टीम के सरबराह की सख्त नज़रें कमरे का जायज़ा ले रही थीं। उस लम्हे मुझे अपनी नौकरी, अपना वक़ार और उसके मुस्तक़बिल की तबाही, सब एक साथ नज़र आई।
वह लड़की, जो अभी कुछ लम्हे पहले इत्मीनान से लिख रही थी, एक दम से सकते में आ गई। उसके हाथ कांपने लगे और उसने तेज़ी से वह परची छुपाने की कोशिश की, मगर शायद उसकी दस्तक निगराने टीम के के किसी भी रुकन ने नहीं देखी थी। शुक्र था,
मेरा दिल हलक में आ गया था। मैंने तेज़ी से कदम बढ़ाए और खुद को उसके और निगराने टीम के दरमियान एक ढाल की तरह खड़ा कर दिया। मेरी पेशानी पर पसीने के कतरे नमूददार हो चुके थे। निगराने टीम मेरी तरफ बढ़ रही थी, और उनकी आँखों में शक के बादल साफ दिखाई दे रहे थे। जो उनका काम भी था
“सर, सब ठीक है ना?” टीम लीडर ने मेरे पास आ कर मशकूक लहजे में पूछा।
मैंने बमुश्किल अपने लहजे में ठहराओ लाया और बोला, “जी, बिल्कुल! कुछ तलबा का वक्त खत्म होने के बावजूद वह अपने जवाबात को कामयाबी की शक्ल दे रहे थे।
मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मैं जानता था कि अगर उन्होंने उसकी मेज़ की तलाशी ली, तो न सिर्फ़ वह पकड़ी जाएगी, बल्कि मेरा करियर भी हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा। वह लड़की, जिसकी आँखों में अभी थोड़ी देर पहले कामयाबी की चमक थी, अब वहाँ खौफ़ और दहशत के साये लहराने लगे थे।
यह वह लम्हा था जहां एक उस्ताद का ज़मीर और उसकी मोहब्बत का इम्तिहान एक साथ हो रहा था।
यह लम्हा जज़्बात और खौफ़ के संगम पर खड़ा था। एक उस्ताद और तालबा के माबैन क़ायम वह अख़लाकी सरहद जो अब तक क़ायम थी, उस एक लम्हे ने पाश-पाश कर दी।
मैंने पूरी मुस्तैदी से उसके क़रीब से गुज़रते हुए सरगोशी की, “परची मुझे दे दो।”
वह एक सेकंड के लिए ठिटकी, घबराई ,मगर फ़िर उसकी उंगलियां मेरी हथेली से जा टकराईं। उसने अपनी मुट्ठी में छुपाई हुई नक़ल मुझे थमाने के लिए अपना हाथ मेरी मुट्ठी में पैवस्त कर दिया। यह अमल इतना तेज़, इतना अचानक और इतना पुर-असरार था कि जैसे बिजली का एक झटका मेरे जिस्म के आर-पार गुज़र गया हो। उसकी उंगलियों की नरमी और उसके लम्स की तपिश ने मेरे वजूद में एक लरज़ा बरपा कर दिया था। मैंने जल्दी से परची अपनी जेब में डाली और आगे बढ़ गया, मगर मेरा दिल मेरे सीने में नहीं, कहीं और धड़क रहा था। अब टीम कमरे से बाहर जाने के लिए एक्जिट की तरफ बढ़ रही थी।
निगराने टीम की आमद और उनका वहाँ से चले जाना, अब मुझे ख्वाब जैसा लग रहा था। लेकिन वह एहसास वह उसके लम्स की याद ओर अहसास मेरे वजूद में अब भी पूरी शिद्दत से मौजूद थे। टीम तो चली गई थी, मगर वह जो एक अनदेखी लकीर हम ने पार कर ली थी, वह अब हमारे बीच एक गहरा निशां बन कर रह गई थी।
मैंने तो अनजाने में, हड़बड़ाहट में कह दिया था कि “मुझसे मिलना,” मगर अब मुझे अपनी कही हुई इस बात की संगीनी का एहसास हो रहा था। उसके हाथ की वह गिरफ़्त, जो चंद लम्हों के लिए मेरे हाथ में रही थी, अब मेरे दिमाग से नहीं निकल रही थी। वह सिर्फ़ एक नक़ल का तबादला नहीं था, वह दो रूहों के दरमियान एक ऐसा अहद था जिसका अंजाम शायद सिर्फ़ “एक आह” और इसके सिवा कुछ न हो क्या मुहब्बतों कि इब्तिदा ऐसे ही हादसे से शुरू होकर आगे बढ़ती है।
मगर मेरे क़दमों में एक लर्ज़िश थी। मैंने स्कूल के गेट की तरफ़ देखा जहाँ गेट के पास, छांव और धूप का खेल जारी था, वह मेरा इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही मैं करीब पहुँचा, वह मेरी तरफ़ बढ़ी, उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा इत्मीनान था। और एक हल्की सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर तैर रही थी।
उसने अपनी नज़रें मेरी आँखों में गाड़ दीं और बिला-साख्ता बोल उठी,
“सर, मेरा नाम रंजीता है। मैं आपको जानती हूँ, क्योंकि आपका स्कूल मेरे स्कूल जाने वाले रास्ते में ही पड़ता है। मैं अक्सर आपको वहाँ देखती थी, मगर कभी बात करने की हिम्मत नहीं हुई। आज तो बस… एक बहाना चाहिए था आपसे मुखातिब होने का।”
उसके अल्फाज़ जैसे मेरे कानों उतर रहे थे। मैं जो उसे एक आम तालबा या लड़की समझ रहा था, उसने तो मुझे बहुत पहले से अपनी नज़रों के हिसार में ले रखा था। वह नक़ल तो बस एक ज़रिया थी, ओर वक़्त की नज़ाकत भी,
उसकी आवाज़ में वह एतमाद था जिसने मेरे दिल को एक बार फिर लरज़ा दिया। उसने मुझे बताया कि वह मुझे देखती रही है, कि उसने मुझे अपनी ज़िंदगी के रास्तों का हिस्सा बना लिया है।
मैं वहाँ खड़ा उसकी बात सुन रहा था, और मेरे ज़हन में ख़्यालात गूंज रहे थे जो मैंने कभी अपनी डायरी श में लिखे थे,वह हसरतें, वह ख्वाब जो देखे नहीं गए, और आज अचानक वो हसरतें जो शायद हमारी इस पहली पहचान से ही शुरू हो गई थीं।
मैंने गर्दन उठा कर उसे देखा। रंजीता… इस नाम में एक ऐसी मौसीकी थी जो मेरे दिल में किसी पुरानी ग़ज़ल की तरह उतर गई।
“रंजीता…” मैंने आहिस्ता से उसका नाम लिया। “तुम्हें मालूम है तुम ने क्या किया है? तुम ने एक उस्ताद को उसके उसूलों से निकाल कर एक ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं, और शायद मंज़िल भी नज़र नहीं आती।”
उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक बार फिर वही तेज़ चमकती आँखों से मुझे देखा और मुस्कुरा कर वहाँ से चल दी। वह जाते-जाते मुझे एक ऐसा सवाल दे गई थी जिसका जवाब देने के लिए मुझे अब अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगानी थी।
यह सिलसिला अब एक मामूल बन चुका था। स्कूल का वह रास्ता, जो पहले महज़ एक रूटीन का हिस्सा था, अब मेरी ज़िंदगी का मेहर बन गया था। कभी किताबों के तबादले के बहाने, हमारी मुलाक़ातें अब रोज़ का किस्सा बन गईं।
वह मुलाक़ातें, जो कभी स्कूल के गेट तक महदूद थीं, अब शहर के किसी ख़ामोश कोने या किसी पुरसुकून बाग़ तक पहुँच गईं। हम दोनों जानते थे कि यह ताल्लुक़ समाज की नज़रों में “मोतबर” नहीं है, मगर उन लम्हों में हमें दुनिया की परवाह कहाँ थी?
रंजीता के साथ गुज़रा हुआ हर लम्हा किसी ख़्वाब जैसा होता। वह मुझसे अपने मुस्तक़बिल की बातें करती, अपनी शायरी सुनाती, और मैं उसे दुनिया के ऐसे फ़लसफ़े समझाता जो निसाब में कहीं नहीं थे। लेकिन उन मुलाक़ातों में एक अजीब सी तल्ख़ी भी शामिल थी। हर मुलाक़ात के बाद, जब वह अपने घर की तरफ मुड़ती, तो मेरे दिल में वही “एक आह” गूंजती।
मुझे एहसास होता कि मैं उसे क्या दे रहा हूँ? एक ऐसी मोहब्बत जो कभी किसी अंजाम को नहीं पहुँच पाएगी? उसके साथ हर क़दम पर मुझे यह डर सताता कि कहीं कल को कोई हम दोनों को एक साथ देख न ले, कहीं उसकी ज़िंदगी पर हरफ न आए, और कहीं मेरा वक़ार इस मोहब्बत की भेंट न चढ़ जाए।
वह मुझसे बे-पनाह अक़ीदत रखती थी, शायद इसीलिए उसने मुझे अपना “उस्ताद” से बढ़ कर एक “मेहरम-ए-राज़” बना लिया था। मगर मेरे अंदर का जीता-जागता ज़मीर, जो कभी-कभी ख़ामोशी तोड़ता, तो मुझे यही कहता,
“यह मोहब्बत नहीं, यह एक ऐसी आग है जिसमें तुम ख़ुद भी जल रहे हो और उसे भी जला रहे हो।”
मगर फ़िर, जब वह अपनी उन चमकती आँखों से मुझे देखती, तो मेरी तमाम तर फिक्रें, तमाम तर ख़ौफ हवा में तहलील हो जाते। उस वक़्त ऐसा लगता जैसे वक़्त वहीं ठहर गया हो।
हम अब भी मिलते थे, मुस्कुराते थे, बातें करते थे, लेकिन उन बातों के बीच में एक ऐसा ख़ला था जिसे हम दोनों ही भरने से डरते थे।
इस कहानी में अब एक ऐसा ठहराओ आ गया है जो वक्त के साथ-साथ गहरा होता जा रहा है। यह “अहद-ए-शबाब” है, जहाँ जज़्बात तूफ़ान की तरह होते हैं लेकिन हक़ीक़तें पत्थर की दीवार जैसी सख़्त।
हमारी मुलाक़ातों का यह सिलसिला अब रुकता नहीं था। रंजीता अभी अपनी तालीम मुकम्मल कर रही थी और मैं, एक उस्ताद के तौर पर, उसके ख़्वाबों के तहफ्फुज़ की कोशिश कर रहा था। हम दोनों जानते थे कि यह ताल्लुक़ वक़्ती नहीं है, इसे किसी न किसी मुस्तक़िल अंजाम तक तो पहुँचना ही था, मगर हम एक ऐसे बंधन में थे जिसे न तो तोड़ना मुमकिन था और न ही निभाना।
वह अब भी वही चमकती आँखें लिए मेरे पास आती, लेकिन अब उनमें बचपना कम और एक गहरी समझदारी ज़्यादा थी। वह मुझसे कहती, “सर, यह रास्ते, यह मुलाक़ातें… क्या यह हमेशा ऐसे ही रहेंगे?”
और मैं उसे बस देखता रह जाता। मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था। मैं उसे यह तो कह सकता था कि “मैं तुम्हारा हूँ,” लेकिन यह कहना कि “मैं तुम्हें अपना बना सकता हूँ,” मेरे लिए सबसे बड़ा झूठ होता। समाजी फ़ासले, अमीरी गरीबी हैसियत का फ़र्क़, और स्कूल का वह तक़द्दुस जिसे हम ने अपनी मोहब्बत के लिए दांव पर लगाया था,यह सब दीवारें इतनी बुलंद थीं कि हमें अपने अंजाम तक पहुँचने के लिए किसी मोजज़े की ज़रूरत थी।
हम ने तय किया कि हम सब्र करेंगे। रंजीता अपनी पढ़ाई पर तवज्जो देगी और मैं अपने करियर के साथ-साथ उसकी राह में आने वाली रुकावटों को हटाता रहूँगा। यह “कुछ साल” हमारे लिए इम्तिहान के साल थे। हम ने अपनी मोहब्बत को एक ऐसी अमानत की तरह संभाल रखा था जो अभी पकी नहीं हुई थी।
कभी-कभी जब हम किसी वीरान जगह पर बैठते, मैं जानता था कि वह मेरी ज़िंदगी का वह आखिरी ख़्वाब है जो मैंने अपनी आँखों में बसाया है।
लेकिन इस इंतज़ार ने हमें अंदर से थका दिया था। हम दोनों जानते थे कि यह जवानी का वक्त है, जहाँ जज़्बात उरूज पर होते हैं, मगर किस्मत ने हमें खामोश रहना सिखा दिया था। वह दूर की वह धुंध थी जिसके पार हम मंज़िल तो देख सकते थे, मगर वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अभी वक़्त के पहलू में कहीं छुपा हुआ था।
…वह इम्तिहान का दिन, वह नक़ल की परची, वह पहली मुलाक़ात और फिर बरसों का इंतज़ार। हमारी कहानी जब अपने नुक्ता-ए-उरूज पर थी, तब मेरे एक क़रीबी दोस्त ने मुझे हक़ीक़त के सर्द आईने के सामने खड़ा कर दिया। उसने सख़्ती से कहा “जानता है तू कौन है? वह अपने शहर की एक नामवर हस्ती की बेटी है, जिसके सामने तेरा वज़ूद कुछ भी नहीं है। यह मेल, यह रिश्ता, कभी मुमकिन न होगा।”
जब मैंने यह तल्ख़ हक़ीक़त रंजीता के गोश-गुज़ार की, तो वह कुछ देर साकित रही। उसके चेहरे पर कोई रद्द-ए-अमल नहीं था, बस एक गहरी ख़ामोशी छा गई थी। इस ख़ामोशी में वह सब कुछ था जो अल्फाज़ नहीं कह सकते थे। उस दिन के बाद हम ने कभी अपनी मोहब्बत को किसी ‘नाम’ या ‘रस्म’ का क़ैदी नहीं बनाया।
आज बरसों बीत चुके हैं। न उसने शादी की, न मैंने कभी किसी और को अपने दिल की दहलीज़ पर आने दिया। हमारे इस ख़ामोश अज़्म और पाकीज़ा इंतज़ार के चर्चे आज भी हमारे शहर की फिज़ाओं में गूंजते हैं। लोग बातें करते हैं, मगर हम ने अपने इश्क़ को एक ऐसे हिसार में महफूज़ कर लिया है जहाँ समाज की तनकीद नहीं पहुँच सकती।
हम आज भी मिलते हैं। मगर अब वह पुराना इज़्तिराब नहीं, अब हमारे दरमियान एक “अदब की दूरी” है। वह मुलाक़ातें अब एक दूसरे को पाने की नहीं, बल्कि एक दूसरे को देखने और रूह को सुकून पहुँचाने का नाम हैं। हम एक दूसरे के क़रीब बैठ कर भी जैसे दो मुख़्तलिफ़ दुनियाओं के बासी लगते हैं, जहाँ अल्फाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।
मेरी ज़िंदगी की किताब में, मैं ने इन तमाम जज़्बों को यूँ महफूज़ कर लिया है।
“एक आह”उन हसरतों के नाम, जो समाजी दीवारों के पीछे दफ़न हो गईं।
“एक दिलासा” उन ख़्वाहिशों के लिए, जो हम ने कभी पूरी न होने का यक़ीन कर के भी ज़िंदा रखा।
“मोतबर आँसू” उन ख़्वाबों की नज़र, जिन्हें हम ने हक़ीक़त बनाने के बजाय अपना जीवन साथी बना लिया।
“अकीदत भरा बोसा” हमारी उस तवील ख़ामोशी को, जो आज भी हमारे दरमियान पुल का काम करती है।
उन लोगों की(बोसीदा नदामत) पुरानी सोच पर पछतावा, जो मोहब्बत को सिर्फ़ एक ‘मंज़िल’ का मोहताज समझते रहे।”
हमारी मोहब्बत अब कोई अधूरी दास्तान नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘इबादत’ बन गई है जो किसी अंजाम की तलब-गार नहीं। हम ने दुनिया को पा कर नहीं, बल्कि एक दूसरे की यादों और अदब की इस लकीर के साथ जीना सीख लिया है।
शायद, यही हमारी मोहब्बत का वह आख़िरी और सबसे ख़ूबसूरत इख्तिताम है, एक-दूसरे के होने के बावजूद, हम एक-दूसरे के लिए एक पावन स्मृति बनकर जीवित हैं।”
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
