प्रगतिशील लेखक संघ, इलाहाबाद में बदलाव की आवश्यकता
प्रगतिशील लेखक संघ, इलाहाबाद पुरानी उर्जा लिये हुये आगे बढ़ रही है। समय-समय पर साहित्यिक चर्चा कर लेती है। थोड़ा बहुत संतोष हो जाता है। अगर प्रगतिशील लेखक संघ इलाहाबाद कुछ नये ढंग से कार्यक्रम का आयोजन करे तो कुछ सकारात्मक स्वर सामने आने की संभावना है।
प्रगतिशील लेखक संघ को कुछ नये दृष्टि पर काम करना होगा। कभी एक लेखक पर, कभी एक कवि पर कभी एक पुस्तक पर चर्चा हो जाती है लेकिन वह संपूर्णता नहीं प्राप्त कर पाती है।
प्रगतिशील लेखक संघ इलाहाबाद सचमुच साहित्य पर गंभीर है तो गंभीर दृष्टिकोण के साथ कदम से कदमताल मिलाना पड़ेगा।
प्रगतिशील लेखक संघ को विधात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे की तैयारी करे। प्रत्येक माह एक साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन करे और एक विधा उस दिन निर्धारित करे।
उदाहरण के लिए उस दिन कहानी विधा पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन करना है। इलाहाबाद में जितने कहानीकार छोटे बड़े हो सबको आमंत्रित करें। किसी एक कहानी पर वाचन हो। कहानी विधा के लेखन पर चर्चा हो।
कहानी लेखन में किन-किन तत्वों को सम्मलित किया जाता है। उस पर वृहद चर्चा हो। नये रचनाकारों को प्रोत्साहित किया जाये। लेखन में जो कमी होती है। अशुद्धियाँ जो हो उस पर ध्यान आकृष्ट किया जाये। फिर अगले माह अगली विधा पर।
कहानी में कथानक क्या है? उस पर चर्चा हो। पात्र कैसे रखें जाये, उनके चरित्र को कैसे विकसित करें।
कहानी के प्रमुख तत्वों में कथानक, पात्र और चरित्र-चित्रण, संवाद, भाषा-शैली, देशकाल और वातावरण तथा उद्देश्य शामिल होते हैं; कथानक कहानी की रीढ़ होता है जो घटनाओं के क्रम और ढांचे से रोचकता व प्रवाह देता है,
पात्रों का सजीव चित्रण उनके स्वभाव, व्यवहार और आपसी संबंधों के माध्यम से कहानी को विश्वसनीय और भावनात्मक बनाता है, सशक्त संवाद पात्रों की बातचीत को स्वाभाविक व प्रभावशाली बनाते हैं, भाषा-शैली सरल, स्पष्ट और प्रवाहपूर्ण हो तो पाठक संलग्न रहता है।
विधात्मक दृष्टिकोण अगर अपनाया जाये तो सीखने सीखाने का एक नया मंच, नये, पुराने लेखकों को मिलेगा और एक मंच पर उस विधा पर खुलकर चर्चा होगी तो एक नई उर्जा का संचरण होगा। एक दूसरे से मेल मिलाप भी हो जायेगा।
प्रगतिशील लेखक संघ को सदस्यता अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है। ज्यादा से ज्यादा हिन्दी साहित्य में रुचि रखने वालों को जोड़ा जाये। प्रगतिशील लेखक संघ इलाहाबाद को जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को उतार कर नया वस्त्र धारण करने की आवश्यकता है।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
