रोपनी में रौंदल देहिया
माटी की खुशबू,
रोपनी में झुकी देहिया,
बरखा मुस्काई।
धान के नन्हे पौधे,
हाथों में सपनों की हरियाली,
धरती गुनगुनाए।
कीचड़ भरे पग,
फिर भी मन में उजियारा,
किसान मुस्काए।
बादल की छाया,
खेतों पर प्रेम बरसाए,
जीवन लहराए।
नन्ही-सी कोंपल,
आशा का दीप जलाए,
अन्न बन जाए।
पसीने की बूंदें,
मोती बन खेत सजाएँ,
धरती धन्य हो।
रोपनी का गीत,
हवा में धीरे बहता है,
गाँव मुस्काता।
रौंदल देहिया,
फिर भी हृदय खिला है,
माटी माँ हँसी।
हरियाली की गोद,
मेहनत की सुंदर गाथा,
कल का उत्सव।
धान की बालियाँ,
सपनों की राह दिखाएँ,
जीवन महके।
— डॉ. अशोक
