शिक्षा के मंदिरों का संरक्षण,राष्ट्र निर्माण और भविष्य के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी भावी पीढ़ियों के हाथों में होती है, और भावी पीढ़ियों का निर्माण ‘शिक्षा के केंद्रों’ में होता है। रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के संदर्भ में उपजे विवाद को केवल कानूनी या राजनीतिक चश्मे से देखना देश के भविष्य के लिए एक अदूरदर्शी दृष्टिकोण हो सकता है। जब हम अरबों रुपये की लागत से बनी 40 आलीशान इमारतों और वहां संचालित 98 कोर्सेज को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हज़ारों विद्यार्थियों के सपनों का एक जीवंत परिसर है। न्याय की परिभाषा केवल क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि उस न्याय का उद्देश्य ‘सुधारात्मक’ और ‘सकारात्मक’ होना चाहिए। किसी शिक्षण संस्थान को ध्वस्त करना न तो न्यायसंगत हो सकता है और न ही देशहित में, क्योंकि एक इमारत को ज़मींदोज़ करने से उस मिट्टी पर लगे शिक्षा के उन पौधों को उखाड़ दिया जाएगा, जो भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और न्याय प्रणाली को मज़बूती प्रदान करने वाले थे।
देशहित की दृष्टि से, एक विकसित और समर्थ भारत को अपने संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग करना चाहिए। यदि किसी संस्थान के निर्माण या मालिकाना हक़ में प्रशासनिक खामियां हैं, तो उनका समाधान ‘ध्वस्तीकरण’ के बजाय ‘सुधार’ के रूप में निकाला जाना चाहिए। सरकार के पास यह नैतिक और प्रशासनिक शक्ति है कि वह ऐसी संस्थाओं का अधिग्रहण कर उन्हें राज्य-संचालित विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्तित करे। इससे न केवल बुनियादी ढांचे का बचाव होगा, बल्कि उस क्षेत्र के उन मेधावी बच्चों का सत्र भी बर्बाद नहीं होगा जो वहां से अपनी डिग्री पूरी करने का सपना संजोए बैठे हैं। एक मज़बूत इमारत को खंडहर में बदलना संसाधनों की बर्बादी है,इसके विपरीत, उसे शैक्षणिक उपयोग में लाना राष्ट्र निर्माण का परिचायक है।
बच्चों का भविष्य किसी भी राजनीतिक प्रतिशोध से ऊपर होता है। जिस पल हम शिक्षा के गलियारों में राजनीति को प्रवेश करने देते हैं, उस पल हम उस पीढ़ी को असुरक्षित कर देते हैं जिसे कल इस देश का नेतृत्व करना है। क़ानून का शासन सर्वोपरि है, लेकिन न्याय का तकाज़ा यह है कि दंड की प्रक्रिया में ‘विद्या’ और ‘विद्यार्थी’ को सबसे कम कष्ट हो। यदि ज़मीन या निर्माण से संबंधित विवाद है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के जरिए नियमित करना, जुर्माना लगाना या नाम और प्रबंधन बदलना संभव है, लेकिन बुलडोजर चलाना एक ऐसा क़दम है जिसका दंश सालों तक शिक्षा जगत महसूस करेगा। अंततः एक संवेदनशील समाज की पहचान वही है जो अपने विद्या के केंद्रों को सहेज कर रखे, क्योंकि खंडहरों से केवल इतिहास मिलता है, जबकि सुचारू शिक्षण संस्थानों से एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है। न्याय की सच्ची सार्थकता इसी में है कि हम इमारतों को गिराने के बजाय, उनमें ज्ञान का प्रकाश जलाए रखने का मार्ग प्रशस्त करें, ताकि रामपुर का यह केंद्र आने वाले दशकों तक देश को कुशल इंजीनियर, डॉक्टर और विधिवेत्ता प्रदान करता रहे।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
