ग़ज़ल
हाथ तुम्हारे भी काले हैं
क्यों सबके मुँह पर ताले हैं?
वे भी शातिर-डाकू निकले,
हम समझे भोले-भाले हैं।
बाबर-खिलजी लगते बौने
सवा शेर अपने वाले हैं।
तुमने तो बस चोरा माखन,
यहाँ धुरंधर रखवाले हैं।
कालिख मुँह की बता रही है,
उजले चेहरे छल वाले हैं।
चीरहरण हो गया अनूठा,
पांडव ही करने वाले हैं।
तुमने यह जो ज़ख़्म दिये हैं,
नहीं कभी भरने वाले हैं।
ये सिक्के भी निकले खोटे,
लगता था चलने वाले हैं।
अवधपुरी में लुट गयी सीता,
लखनलला हरने वाले हैं।
राम नाम सत् कर डालेंगे
राम-राम करने वाले हैं।
‘शरद’ संभलकर गले लगाना,
बगल छुरी धरने वाले हैं।
— शरद सुनेरी
