उधार की चमक
वे उधार लेकर “शान” दिखाएँ,
फिर किस्तों में “आँसू” बहाएँ।
सेल लगे तो दिल मचल जाएँ,
बटुआ बोला—”मैं चला बाय!”
क्रेडिट कार्ड की ऐसी हैं माया,
यूं ज़रूरत ने रूप बदल पाया।
बंधु ईएमआई की मीठी गोली,
महीने भर की जेब हुई खाली।
मोबाइल नया, घड़ी भी न्यारी,
फोटो खिंची तो दुनिया सारी।
घर में दाल का “हाल” बुरा है,
बाहर कॉफी रोज़ पुरा रहा है!
बैंक भी बोले—”लो जी लोन!”,
ग्राहक बोला—”कर दो ऑन!”
कल की “कमाई” आज उड़ाई,
फिर किस्मत पर उँगली उठाई।
(संदर्भ-टीयूसी सर्वें-उधार लेकर खर्च करते जेन-जी)
— संजय एम तराणेकर
