शिक्षा की लड़ाई : एक खुशनुमा शाम को लाने की कोशिश
शिक्षा मानव जीवन का वह अमूल्य प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और संस्कार का दीप प्रज्वलित करता है। यह केवल पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य बनाने की साधना है। जिस समाज में शिक्षा का प्रकाश पहुँचता है, वहाँ विकास, समानता, न्याय और मानवीय मूल्यों का सूर्योदय होता है। इसलिए शिक्षा की लड़ाई किसी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का महाअभियान है। यह उस खुशनुमा शाम को लाने की कोशिश है जिसमें हर चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान हो, हर घर में आशा का दीप जले और हर बच्चे के सपनों को उड़ान मिले।
आज का युग तीव्र परिवर्तन का युग है। ज्ञान के नए आयाम खुल रहे हैं, जीवन की चुनौतियाँ निरंतर बदल रही हैं और समाज नई अपेक्षाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षा की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आज भी अनेक बच्चे गरीबी, सामाजिक विषमता और संसाधनों के अभाव के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं। कहीं विद्यालय हैं तो शिक्षक नहीं, कहीं शिक्षक हैं तो आवश्यक सुविधाएँ नहीं, और कहीं सुविधाएँ हैं तो शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा और अंक प्राप्त करने तक सीमित होकर रह गया है। ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा की लड़ाई केवल विद्यालयों तक पहुँचने की नहीं, बल्कि शिक्षा को जीवन से जोड़ने की लड़ाई है।
आज आवश्यकता ऐसी शिक्षा की है जो बच्चों को रटने के बजाय सोचने की शक्ति दे, प्रतियोगिता के साथ सहयोग का भाव सिखाए और केवल आजीविका ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी प्रदान करे। शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह संवेदनशील, उत्तरदायी, रचनात्मक और चरित्रवान नागरिक तैयार करेगी।
इसी संदर्भ में सोनम वांगचुक का कार्य अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चों की जन्मजात प्रतिभा को पहचानना और उसे विकसित करना है। लद्दाख की विषम परिस्थितियों में उन्होंने स्थानीय आवश्यकताओं, प्रकृति और अनुभव आधारित शिक्षा का जो स्वरूप प्रस्तुत किया, उसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। उनका विश्वास है कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन की समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता विकसित करे। उनका कार्य हमें यह संदेश देता है कि यदि शिक्षा समाज, प्रकृति और संस्कृति से जुड़ जाए तो वह परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।
आज जब अधिकांश युवा केवल प्रमाण-पत्र और रोजगार की चिंता में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तब यह आवश्यक है कि शिक्षा उन्हें आत्मनिर्भरता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी बोध कराए। शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल व्यक्ति बनाना नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक बनाना है।
इस परिवर्तन में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षक वह शिल्पकार है जो बालमन को आकार देता है, जिज्ञासा को दिशा देता है और सपनों को साकार करने का साहस प्रदान करता है। वहीं माता-पिता और समाज का दायित्व है कि वे बच्चों पर केवल अंक प्राप्त करने का दबाव न डालें, बल्कि उनके व्यक्तित्व, संस्कार और सृजनात्मकता के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें।
आज पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टि और मानवीय संवेदना को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना समय की माँग है। जब शिक्षा इन मूल्यों से समृद्ध होगी, तभी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित और सुदृढ़ होगा।
वास्तव में शिक्षा की लड़ाई एक ऐसे भारत के निर्माण की लड़ाई है जहाँ कोई बच्चा अवसरों से वंचित न रहे, कोई युवा अपनी प्रतिभा को दबाने के लिए विवश न हो और कोई परिवार अशिक्षा के कारण निराशा का जीवन न जीए। यह संघर्ष अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर और असमानता से समान अवसरों की ओर बढ़ने का संकल्प है।
जब शिक्षा प्रत्येक घर तक पहुँचेगी, जब ज्ञान के साथ संस्कार भी विकसित होंगे, जब विद्यालय जीवन-निर्माण के केंद्र बनेंगे और जब प्रत्येक नागरिक अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा, तब सचमुच एक ऐसी खुशनुमा शाम आएगी जिसमें विकास के साथ मानवीय संवेदनाएँ भी होंगी, समृद्धि के साथ समानता भी होगी और प्रगति के साथ करुणा भी होगी। वही शाम शिक्षा की सबसे बड़ी विजय होगी और वही एक सशक्त, समरस तथा जागरूक राष्ट्र की पहचान बनेगी।
— डॉ. अशोक

आपको भयंकर ग़लतफ़हमी है. सोनम वांगचुक और कॉकरोच पार्टी का उद्देश्य शिक्षा पद्धति को सुधारना कतई नहीं है. उसे उद्देश्य केवल मोदी सरकार को बदनाम करना और हीरो बनना है. इसने अपने जो स्कूल खोले हैं, वे बुरी तरह फ्लॉप रहे हैं. यदि इसका उद्देश्य शिक्षा का स्तर उठाना होता तो सबसे पहले एडमिशन केवल योहयता के आधार पर देने की मांग करता। वास्तव में यह विदेशी तत्वों के हाथ की कठपुतली है. अनशन केवल एक ढोंग है.