कविता

कुर्सी की गंध

यह गंध बड़ी ही न्यारी है,
नेताओं को लगती प्यारी है,
चमचों की टोली डोल रही,
हर गली सुगंधी घोल रही,
यह गंध नहीं है फूलों की,
यह बू है भूखे व्याकुलों की,
जो पहले चरणों में गिरते,
हाथों में झोली ले फिरते,
बनकर के दीन और लाचार,
मांगते फिरते हैं अधिकार,
फिर जन-मस्तिष्क पर चढ़ जाते,
अपनी ही ढपली बजाते,
पैसों की बोरी खुलती है,
ईमान की हस्ती धुलती है,
बोतल से मौसम बनता है,
हर वोटर भीतर तनता है,
यह खेल बड़ा ही भारी है,
बस पांच बरस की यारी है,
फिर जैसे ही चुनाव बीता,
सब भूल गए कौन हारा-जीता,
खातों की बही निकालते हैं,
पाई का हिसाब संभालते हैं,
चमचों को मिलता माल नया,
जनता पूछे भैया, क्या आया?
सिंहासन मिलते ही बदले,
जो कल तक थे बिल्कुल पतले,
अब ठाठ-बाठ हैं भारी जी,
बन बैठे खड्ग त्रिधारी जी,
स्वयंभू भगवान कहाते हैं,
हमको ही आंख दिखाते हैं,
यह गंध व्यवस्था की सड़न,
जनता के मन की है जलन।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554