तवायफ
कहते हैं उसको तवायफ वो तो मुजरा करती है।
अनगिनत आंँसू है आँखों में वो आहें भरती है।।
ज़ख्म गहरे हैं बहुत जिक़्र नही कर सकते हैं।
बारहा बाजों से खुद को ही बचाया करती है।।
देखते है ये जहांँ वाले उसे नफ़रत से।
जीते जी ताने जहांँ वालों के सुन वो मरती है।।
हार पहना देतें हैं उसको गुनाहों का हम तो।
फिर भी हमसे न कोई वो यूं शिकायत करती है।।
तुम मुहब्बत से उसे देखो उसे भी हक़ इसका।
सोच कर बातें यही आँख भी उसकी भरती है।।
— प्रीती श्रीवास्तव
