जामुन वाली अम्मा
गांव का नाम था नरसिंहपुर। गांव के आखिरी छोर पर, टूटे हुए कुएं और बरगद के पेड़ के पास एक छोटा सा कच्चा घर था। उसकी दीवारों पर गोबर की लिपाई थी और आंगन के बीचोंबीच एक बहुत बड़ा जामुन का पेड़ खड़ा था। गर्मी आते ही उसकी डालियां काले-काले जामुनों से झुक जाती थीं। पूरे गांव में उस घर को “जामुन वाली अम्मा का घर” कहा जाता था। उस अम्मा का नाम कौशल्या था।
कौशल्या अम्मा की उम्र सत्तर के आसपास रही होगी। दुबली-पतली, सफेद साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी और हाथ में हमेशा एक लाठी। बाल सफेद हो गए थे पर आंखों में अब भी बच्चे जैसी चमक थी। वो अकेली रहती थीं। गांव वाले कहते थे उनका एक बेटा राजू था जो शहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया।
गांव के बच्चे कौशल्या अम्मा से बहुत डरते थे। डर की वजह वो जामुन का पेड़ था। बच्चे आपस में कहते थे कि अम्मा रात को पेड़ से बातें करती हैं और जो भी जामुन चुराने जाता है उसे श्राप देती हैं। इसलिए शाम ढलते ही कोई भी उस गली से नहीं गुजरता था।
उस साल जून की छुट्टियों में शहर से दो बच्चे आए, आरव और मीरा। ये तिवारी काका के नाती-नातिन थे जो पड़ोस में रहते थे। आरव दस साल का और मीरा आठ साल की थी। दोनों बहुत शरारती थे। एक दिन दोपहर में आंगन में बैठे-बैठे आरव की नजर जामुन के पेड़ पर पड़ी। उसने कहा “दीदी, देखो कितने जामुन लगे हैं।” मीरा ने तुरंत कहा “वो जामुन वाली अम्मा का घर है, दादी कहती हैं वहां भूत रहता है।” आरव हंसकर बोला “भूत नहीं होते, चल चुराकर लाते हैं।”
दोनों चुपके से निकले और दीवार फांदकर अम्मा के आंगन में कूद गए। कदम रखते ही जामुन की मीठी खुशबू आई। जमीन पर गिरे जामुन बिखरे पड़े थे। आरव ने झट से दो-चार उठाकर खा लिए। तभी अंदर से आवाज आई “कौन है रे?” डर के मारे दोनों की सांस अटक गई। सामने से कौशल्या अम्मा लाठी टेकती हुई निकलीं। दोनों भागने लगे तो अम्मा ने कहा “ठहरो, गिर जाओगे।”
आरव और मीरा सहमकर खड़े हो गए। अम्मा ने गुस्से से नहीं बल्कि प्यार से देखा और पूछा “जामुन खाने का मन था ना?” दोनों ने सिर हिला दिया। अम्मा अंदर गईं और एक थाली में जामुन और काला नमक लेकर आईं। “बैठकर खाओ। चोरी करके खाने में स्वाद नहीं आता।” उस दिन उन्होंने जिंदगी के सबसे मीठे जामुन खाए।
उस दिन के बाद आरव और मीरा रोज दोपहर में अम्मा के पास जाने लगे। पहले छुपकर फिर खुलेआम। अम्मा उन्हें अपने बेटे राजू की कहानियां सुनातीं। बतातीं कि राजू कैसे इसी पेड़ पर चढ़कर जामुन तोड़ता था और एक बार गिर भी गया था। कहानी सुनाते-सुनाते अम्मा की आंखें भर आतीं। मीरा ने एक बार पूछ ही लिया “अम्मा आपके बेटे आपसे मिलने क्यों नहीं आते?” अम्मा ने आसमान की तरफ देखकर कहा “शहर में काम है बेटा, बड़े आदमी बन गए हैं, फुर्सत नहीं होगी।” पर उनकी आवाज कांप जाती थी। धीरे-धीरे गांव वालों को भी समझ आ गया कि अम्मा कोई डायन नहीं हैं, बस एक अकेली बूढ़ी औरत हैं जिन्हें अपनों का इंतजार है।
फिर एक साल बरसात में बहुत बड़ा तूफान आया। आधी रात को आंधी और बिजली से गांव थर्रा गया। सुबह पता चला कि अम्मा के घर की छत उड़ गई है और जामुन का एक बड़ा तना टूटकर आंगन में गिर पड़ा है। अम्मा मलबे में दब गई थीं। पूरे गांव में हड़कंप मच गया। आरव और मीरा रोते हुए दौड़े। गांव के लड़कों ने मलबा हटाकर अम्मा को निकाला। डॉक्टर ने कहा चोट ज्यादा नहीं है पर अब इन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। अम्मा का बेटा फोन नहीं उठा रहा था। तीन दिन तक अम्मा तिवारी काका के घर रहीं। आरव और मीरा दिन-रात उनके पास बैठे रहे। होश में आते ही अम्मा ने सबसे पहले पूछा “मेरा जामुन का पेड़ कैसा है?”
तूफान के बाद गांव वालों ने फैसला किया कि अम्मा के घर की मरम्मत सब मिलकर करेंगे। जो लोग पहले अम्मा को डायन समझते थे वो भी आए। मिस्त्री, बढ़ई सबने मिलकर एक हफ्ते में घर फिर से खड़ा कर दिया। जामुन के टूटे तने को सहारा देकर बांध दिया गया। मास्टर जी ने कहा “ये पेड़ सिर्फ अम्मा का नहीं, ये हमारे बचपन की निशानी है।” जब अम्मा ठीक होकर घर लौटीं तो देखा आंगन साफ है, दीवारों पर नई लिपाई है और दरवाजे पर बच्चों की भीड़ खड़ी है। अम्मा की आंखें भर आईं। सरपंच बोले “अम्मा अब आप अकेली नहीं हो, हम सब तुम्हारे अपने हैं।”
अगली गर्मी में अम्मा ने कहा “इस बार जामुन का मेला लगेगा।” पहले लोग हंसे फिर सच में मेला लग गया। अम्मा ने जामुन तोड़े, चटनी बनाई, शरबत बनाया। बच्चे जामुन बेचते और पैसे अम्मा के गुल्लक में डाल देते। उस पैसे से अम्मा ने स्कूल के लिए किताबें खरीदीं। आरव और मीरा अब अम्मा के सबसे खास साथी बन गए थे। वो पोस्टर बनाते, जामुन तोड़ते और शाम को अम्मा के पास बैठते।
एक दिन शहर से चिट्ठी आई। राजू ने लिखा था “मां मुझे माफ कर दो, अब दिवाली पर आ रहा हूं।” अम्मा ने वो चिट्ठी दस बार पढ़ी। उस रात वो सोई नहीं। पूरा घर लीप-पोतकर जामुन का शरबत बनाकर रखा। दिवाली पर राजू आया। तीस साल का बेटा मां को देखते ही छोटा बच्चा बन गया। दोनों बहुत देर तक रोते रहे। राजू ने कहा “मां चलो मेरे साथ शहर।” अम्मा ने जामुन के पेड़ की तरफ देखकर कहा “बेटा मेरी जड़ें यहीं हैं। तू चाहे तो यहीं रह ले। ये घर, ये पेड़, ये बच्चे सब मेरा परिवार हैं।” राजू मान गया। उसने शहर की नौकरी छोड़ दी और गांव में दुकान खोल ली। अब वो रोज शाम को अम्मा के लिए दूध लाता और बच्चों के साथ जामुन खाता।
आज कौशल्या अम्मा अस्सी की हो गई हैं। चलना-फिरना कम हो गया है पर हिम्मत वही है। जामुन वाले घर के बाहर अब एक बोर्ड लगा है “कौशल्या अम्मा का जामुन वाला घर – सबके लिए खुला”। गर्मियों में यहां बच्चों की भीड़ लगी रहती है। अम्मा चारपाई पर बैठकर कहानियां सुनाती हैं और बच्चे जामुन खाते हैं। आरव और मीरा अब बड़े हो गए हैं, शहर में पढ़ते हैं पर हर गर्मी में सबसे पहले अम्मा से मिलने आते हैं।
अम्मा अक्सर कहती हैं “बेटा जामुन मीठे तब लगते हैं जब उन्हें बांटकर खाया जाए। अकेले खाने से तो गुठली भी कड़वी लगती है।” एक अकेली औरत, एक जामुन का पेड़ और थोड़ा सा प्यार ने पूरे गांव की सोच बदल दी। आज भी रात को जब हवा चलती है और जामुन टप-टप गिरते हैं तो गांव वाले मुस्कुराकर कहते हैं “देखो जामुन वाली अम्मा फिर बच्चों को बुला रही हैं।”
— विकास कुमार शर्मा
