ग़ज़ल
उजले-काले चेहरे देखे,
चेहरे भी कई दोहरे देखे।
सच्ची बातें कह सकते थे,
उन पर लाखों पहरे देखे।
बहुत छिपाना चाहा उसने,
लेकिन घाव थे गहरे देखे।
लगते तो थे राजा जैसे,
हमने बनते मोहरे देखे।
नदियों-सी पहचान जिनकी,
उनको ताल-सा ठहरे देखे।
इंकलाब करते रहते थे,
वक़्त पड़ा तो बहरे देखे।
‘शरद’ बहुत झुलसे सूरज से,
इक दिन बने सुनहरे देखे।
— शरद सुनेरी
