मुंशी प्रेमचंद
प्रेमचंद थे कलम के धनी , जन-मन के थे सच्चे प्राण।
शब्द-शब्द से भारत माँ का, किया जिन्होंने गौरव गान।
होरी, धनिया, घीसू-माधव, जीवन के साकार हैं स्वर।
दुखियों की गाथा को लिखकर , अमर बने उनके अक्षर।
सत्य, न्याय और मानवता का, जग में पावन दीप जलाया।
साधारण जन – संघर्षों को, कथा – कहानी में अपनाया।
चकाचौंध महलों की त्यागी , गाँवों की धड़कनें लिखीं।
शोषित, वंचित, पीड़ित जन में , करुणामय मूर्तियाँ दिखीं।
है ‘गोदान’ की अमर चेतना, दिया ‘गबन’ का नव संदेश।
‘ईदगाह’ में प्रेम झलकता, मानवता का मर्म विशेष।
भाषा सरल, उच्च विचार थे, उनका सांस्कृतिक रहा विधान।
‘उपन्यास सम्राट’ कहाए, प्रेमचंद – युग बना महान।
नहीं शब्द – शिल्पी तुम केवल, हिन्दी – सेवा के प्रतिमान।
जन-जन की वेदना उकेरी, बने सर्वजन की पहचान।
जब तक मानवता जीवित है, तब तक दमकेगा तव नाम।
ध्रुवतारे साहित्य-गगन के तुमको शत-शत मेरा प्रणाम।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
