भ्रम का विसर्जन
हां हम छोड़ेंगे,
तुमसे डरना छोड़ेंगे,
सदियों का जो गुरूर
पाल रखे हो मन में
वो भ्रम भी तोड़ेंगे,
डरना हमारी बपौती नहीं था,
वो थी हमारी मजबूरी,
अब खाल खींच लेंगे
तुम्हारे ओछी अकड़,
तुम्हें अंदाजा नहीं
हमारे पकड़ की,
गुड़ खाने वालों,
क्यों है तुम्हें
परहेज गुलगुलों से,
कर जाते हो ज्यादती
कपोत और बुलबुलों से,
तुमने जो बांटी थी
नफ़रत की दीवारें,
तुमने जो रची थी
ऊंच-नीच की कतारें,
अब उन बेड़ियों को
जड़ से उखाड़ रहे हैं,
तुम्हारे पाखंड का
पन्ना-पन्ना फाड़ रहे हैं,
अब न कोई दबा कुचला,
न कोई लाचार रहेगा,
बराबर का हक होगा,
बराबर का अधिकार रहेगा,
उठ खड़ा हुआ है अब
इंसानियत का सैलाब,
मांग रहा है तुमसे
सदियों का हिसाब,
पहचान लिया है हमने
तुम्हारी चालों को,
अब ढहा रहे हैं
तुम्हारे इन महलों को,
सुन लो ओ हुक्मरानों,
अब न कोई दबेगा,
न कोई झुकेगा,
क्रांति का यह कारवां
अब कहीं न रुकेगा,
तुम्हारी चौखट से अब
सत्ता का डर खत्म कर रहे हैं,
और जो तुमने फैलाई थी,
उस जातीयता को भी।
— राजेन्द्र लाहिरी
