गीत/नवगीत

भेड़ की खाल

चेहरे भोले ओढ़कर, रखते मन में दाँव।
भेड़ों में कुछ भेड़िये, घुसकर देते घाव॥

भेड़ों जैसे बीच में, छिपा हुआ शैतान।
मौका पाते ही करे, विश्वासों का अवसान॥
लिए नकाबी ओट वो, रखते मन में खोट।
अपनों जैसे बन सदा, देते गहरी चोट॥
विश्वासों के नाम पर, देते केवल घाव।
भेड़ों में कुछ भेड़िये, घुसकर देते घाव॥

हर मुस्काता व्यक्ति ही,होतान कब है ख़ास।
कुछ तो केवल ढूँढ़ते, अपना ही उल्लास॥
स्वार्थ सिद्धि तक साथ हैं, फिर लेते हैं मोड़।
मतलब पूरा हो गया, रिश्तों से लें तोड़॥
मतलब जिनका धर्म है, उनसे रखे बचाव।
भेड़ों में कुछ भेड़िये, घुसकर देते घाव॥

संकट में पहचानिए, कौन खड़ा है साथ।
झूठे चेहरे छूटते, सच पकड़ाता हाथ॥
सच्चे जन अनमोल हैं, रखना उनका मान।
जीवन में पहचान ही, सबसे बड़ा विधान॥
सच्चे जन को थाम लो, छोड़ो झूठे दाँव।
भेड़ों में कुछ भेड़िये, घुसकर देते घाव॥

रिश्तों की पहचान है, सच्चा मन-विश्वास।
स्वार्थ जहाँ बसने लगे, मिट जाता उल्लास॥
साथ वही अनमोल है, जो समझे हर भाव।
बाकी सब अवसर मिले, दे जाते बस घाव॥
सच्चे रिश्ते ही सदा, भरते मन के घाव।
भेड़ों में कुछ भेड़िये, घुसकर देते घाव॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh