द्रष्टा
आँखों से आँसु क्यों झराऊँ
थोडे दिन का इंतजार और
बारिश आ जाएँगा तो
मैं तो कपड़ा सुखाने के
तार के जैसे बंधी हुई हूँ
इस डाल से उस डाल में
सुना मैदान में
गर्म सांसों के बीच
नीरव में दिए थे तुम
कुछ मुहूर्त आश्वासन के
कहांँ ले सकी मैं
‘सब कुछ तेरा है’
बोलने के बाद
मुट्ठी भर संकोच कहाँ है?
सचमुच अब कहाँ है
वो आंँसू
वो आहें
कभी कभी अनुभव होता है
उस हवा को ,
जिसमें है
गजराज का विश्वास
हिरनी की प्रार्थना
पता है मुझे , तुम आ जाते हो
मगर आज
क्यों मिल नहीं रहे हो
रूप या अरूप में
कहाँ हो तुम
क्षीर सागर में
हिमालय में
या किसी पत्थर में
में तो खिंच रखा हूँ तुम्हें
अपने विश्वास में
केवल एक नीरव द्रष्टा में
बदलने नहीं दूँगी तुम्हें ,
देखो उसे
टूटे हुए पंख में
छटपटाती चिड़िया
सचमुच तुम हो न
आयोगे …….. कैसे….
उम्मीदों में …..
या …. आँसूओं में !
— पारमिता षड़ंगी
