भारत माँ का सच्चा सपूत : महान बलिदानी मकबूल शेरवानी
भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जो प्रत्यक्ष युद्धभूमि पर नहीं, अपितु अपनी सूझबूझ, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा के बल पर अमर हो गए। कश्मीर के बारामुला निवासी मकबूल शेरवानी ऐसा ही एक नाम है। वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमणकारियों ने कश्मीर घाटी पर आक्रमण किया, तब इस युवा ने अपनी बुद्धिमत्ता और बलिदान से न केवल हजारों निर्दोष कश्मीरियों की रक्षा की, अपितु भारतीय सेना को श्रीनगर पहुँचने के लिए आवश्यक समय भी दिलाया। मकबूल शेरवानी का बलिदान इस बात का प्रमाण है कि कश्मीर की मिट्टी में देशभक्ति और भारत के प्रति अपनत्व की भावना कितनी गहरी रही है।
प्रारम्भिक जीवन
मकबूल शेरवानी का जन्म उत्तरी कश्मीर के बारामुला नगर में हुआ था, जो उस समय एक समृद्ध व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र माना जाता था। बारामुला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, झेलम नदी के किनारे बसे बाजारों और मिश्रित सामाजिक ताने-बाने के लिए प्रसिद्ध था। यहीं पले-बढ़े मकबूल ने अपने आरम्भिक जीवन में ही सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में रुचि लेना शुरू कर दिया था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बारामुला में ही हुई, जहाँ उन्होंने स्थानीय परिवेश से कश्मीरियत, सहिष्णुता और मानवता के मूल्यों को आत्मसात किया। वे शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी से जुड़े और शीघ्र ही एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में उभरे। पार्टी की गतिविधियों में भाग लेते हुए उन्होंने जनसाधारण के अधिकारों, सामाजिक न्याय और कश्मीर के भविष्य को लेकर गहरी समझ विकसित की। यही राजनीतिक जागरूकता आगे चलकर उनके देशभक्तिपूर्ण निर्णयों का आधार बनी।
एक महान देशभक्त का उदय
1947 में भारत विभाजन के समय कश्मीर की स्थिति अत्यंत जटिल थी। रियासत के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह अनिर्णय की स्थिति में थे कि वे भारत के साथ जाएँ या पाकिस्तान के साथ, अथवा स्वतंत्र रहें। इसी बीच पाकिस्तान ने कश्मीर पर बलपूर्वक कब्जा करने की योजना बनाई और कबायली लड़ाकों की आड़ में अपनी सेना को घाटी में भेज दिया। अक्टूबर 1947 में इन आक्रमणकारियों ने मुजफ्फराबाद होते हुए बारामुला पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण के दौरान बारामुला में भारी लूटपाट, हत्याएँ और अत्याचार हुए। महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार की घटनाएँ आम थीं। मकबूल शेरवानी ने अपनी आँखों से यह विभीषिका देखी और तय किया कि वे अपने प्राणों की परवाह किए बिना अपने लोगों और अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे। उनके लिए कश्मीर केवल एक भूभाग नहीं, अपितु भारत का अभिन्न अंग और उनकी आत्मा का हिस्सा था। यही दृढ़ विश्वास उन्हें एक असाधारण देशभक्त के रूप में स्थापित करता है।
आक्रमणकारियों को भ्रमित करने की रणनीति
महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद 27 अक्टूबर, 1947 को भारतीय सेना को श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतारने का निर्णय लिया गया। परंतु समस्या यह थी कि आक्रमणकारी कबायली लड़ाके श्रीनगर के अत्यंत निकट पहुँच चुके थे, और यदि वे कुछ घंटे पहले भी हवाई अड्डे पर कब्जा कर लेते, तो भारतीय सेना का उतरना असंभव हो जाता और पूरा कश्मीर पाकिस्तान के हाथों में चला जाता। ठीक इसी गंभीर क्षण में मकबूल शेरवानी ने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। जब आक्रमणकारियों ने उनसे श्रीनगर हवाई अड्डे तक जाने वाला सीधा मार्ग पूछा, तो उन्होंने जानबूझकर उन्हें गलत और लंबे रास्तों पर भटका दिया। उन्होंने बारामुला और आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न बहानों से आक्रमणकारियों को रोके रखा, कभी मार्ग बताने में देरी करके, तो कभी अफवाहें फैलाकर कि आगे भारतीय सेना बड़ी संख्या में तैनात है। इस प्रकार उन्होंने और उनके कुछ साथियों ने लगभग चार दिनों तक आक्रमणकारियों को उलझाए रखा। इस बहुमूल्य समय के भीतर भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतर चुकी थी और मोर्चा संभाल चुकी थी। यदि मकबूल शेरवानी यह जोखिम न उठाते, तो संभवतः श्रीनगर हवाई अड्डा समय रहते सुरक्षित न हो पाता और कश्मीर का इतिहास ही कुछ और होता।
पकड़े जाने पर मिलीं यातनाएँ
जैसे-जैसे आक्रमणकारियों को यह आभास हुआ कि उन्हें जानबूझकर भटकाया गया है और उनकी योजना विफल हो रही है, उनका क्रोध चरम पर पहुँच गया। उन्होंने मकबूल शेरवानी की खोज शुरू की और अंततः बारामुला में उन्हें पकड़ लिया। पकड़े जाने के बाद आक्रमणकारियों ने उनसे यह स्वीकार करने का दबाव डाला कि वे पाकिस्तान के पक्ष में हैं और कश्मीरियों को भी उनके साथ मिलने के लिए प्रेरित करें। आक्रमणकारियों ने उनसे ‘पाकिस्तान – जिंदाबाद ‘और ‘शेर-ए-कश्मीर – मुर्दाबाद ‘का नारा लगाने का आदेश दिया परंतु मकबूल शेरवानी ने अदम्य साहस दिखाते हुए किसी भी प्रकार का समझौता करने से इनकार कर दिया। उन्होंने खुले तौर पर घोषित किया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और वे इस सत्य से कभी पीछे नहीं हटेंगे। वे शेख अब्दुल्ला के समर्थक थे। वे मुस्लिम लीग और पाकिस्तान सृजन की अवधारणा के घोर विरोधी थे। उनके इस दृढ़ निश्चय ने आक्रमणकारियों को और अधिक उग्र कर दिया।19 वर्षीय मकबूल ने शेख अब्दुल्ला के समर्थन में पाकिस्तानी सशस्त्र बलों द्वारा समर्थित कबायली आक्रमणकारियों के विरुद्ध स्थानीय लोगों को संगठित किया। बारामुला में 25 जुलाई, 1944 को मोहम्मद अली जिन्ना एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करने के लिए आए थे। उन्हें कायद – ए – आजम (महान नेता) कहा जाता था। मकबूल को यह बात बहुत बुरी लग रही थी कि मजहब की दुहाई देने वाला व्यक्ति पूरे मुल्क का रहनुमा (नेता) कैसे हो सकता है? वहाँ बारामूला के नौजवान भी लोगों की तोड़ती – बाँटती तकरीर झेल रहे थे। बीच – बीच में जिन्ना के कार्यकर्ता ‘कायद – ए – आजम जिंदाबाद और ‘मुस्लिम इत्तिहाद जिंदाबाद’ नारों का शोर कर रहे थे । युवा मकबूल को यह सहन नहीं हुआ। वह मंच के करीब पहुँच गया और नारा बुलंद किया – ‘शेर – ए – कश्मीर का क्या इरशाद? ‘हिन्दू, मुस्लिम, सिख इत्तिहाद। ‘उसके साथ एक – दो और साथी भी थे। मामला बिगड़ते देख वे चतुर युवक वहाँ से भागे। उनके पीछे जिन्ना के आदमी दौड़े। किन्तु वे सब युवक फुर्ती से बहती झेलम में कूदे और बहते पानी में पलभर में ओझल हो गए। पीछे से जिन्ना ने कार्यकर्ताओं से पूछा – ‘यह कौन नवजवान था? ‘उत्तर मिला – ‘साहब, यह मकबूल शेरवानी है? नेशनल कांफ्रेंस का सामान्य कार्यकर्ता है।’ जिन्ना मन मसोस कर रह गए। बारामूला का बच्चा – बच्चा मकबूल को जान गया। इससे कश्मीर और पूरे भारत के राष्ट्रवादी नेताओं को बहुत बल मिला। कहा जाता है कि मकबूल, जिन्ना को जूतों की माला पहनाना चाहते थे, परन्तु उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। देश स्वतंत्र हुआ, किन्तु इसके साथ ही भारत बँट गया।
मातृभूमि के लिए हुए बलिदान
अपनी बात पर अडिग मकबूल शेरवानी को क्रूर आक्रमणकारियों ने भीषण यातनाएँ दीं। उन्हें रस्सियों से बरामदे के खंभों से बाँध दिया गया और हाथों में कीलें ठोक दी गयीं। इतिहास और स्थानीय स्मृतियों के अनुसार, उन्हें बारामुला के एक स्थान पर सूली पर चढ़ा दिया गया और चौदह कबायलियों द्वारा गोली मारे जाने से पहले मकबूल ने ‘हिन्दू – मुस्लिम – एकता की विजय’ का नारा लगाया था। तभी हारे हुए शैतानों ने उनके शरीर में ताबड़तोड़ चौदह गोलियाँ उतार दीं । यह हृदयविदारक घटना 7नवंबर, 1947 को बारामुला नगर में घटित हुई, जब भारतीय सेना अपना अभियान चला ही रही थी और आक्रमणकारियों को पीछे धकेलने का प्रयास कर रही थी। इस प्रकार मकबूल शेरवानी ने अपनी युवावस्था में ही, मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में, अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उन्होंने न तो तलवार उठाई और न बंदूक, अपितु केवल अपनी वाणी, बुद्धि और दृढ़ संकल्प के बल पर आक्रमणकारियों की योजना को विफल कर दिया।आज भी भारतीय सेना मकबूल शेरवानी को अपना रक्त मानती है और जब भी उनके स्मारक के पास से कोई जवान निकलता है, तो उनको नमन करना नही भूलता।
ऐतिहासिक धरोहर और सम्मान
मकबूल शेरवानी का बलिदान भारतीय सेना और कश्मीर के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। भारतीय सेना उन्हें कश्मीर के रक्षक और शहीद के रूप में सम्मानित करती है। बारामुला में उनकी स्मृति में एक मोहम्मद मकबूल शेरवानी स्मारक स्थापित किया गया है, जहाँ प्रतिवर्ष कश्मीरी और सरकारी अधिकारी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करते हैं। बारामुला में एक मकबूल शेरवानी सामुदायिक भवन का नाम भी उनके सम्मान में रखा गया है। भारतीय सेना समय-समय पर 1947 के इस ऐतिहासिक संघर्ष के शहीदों को स्मरण करते हुए कार्यक्रम आयोजित करती है, जिनमें मकबूल शेरवानी का नाम विशेष श्रद्धा के साथ लिया जाता है। जम्मू और कश्मीर लाइट इन्फंट्री द्वारा निर्मित बलिदान स्तंभ स्मारक भी मकबूल शेरवानी के नाम पर है। 27 अक्टूबर, 1947 को भारतीय सेना के श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरने के उपलक्ष्य में साहस और सर्वोच्च बलिदान के प्रतीक मकबूल शेरवानी को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है, जिसे अब पैदल सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर मनाए गए “आजादी का अमृत महोत्सव” के अंतर्गत भी जम्मू-कश्मीर में उनकी वीरता और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के विशेष प्रयास किए गए, जिसमें उनकी जन्मभूमि बारामुला में कार्यक्रम आयोजित हुए।
लेखक मुल्कराज आनंद ने अपने उपन्यास ‘डेथ आफ ए हीरो ‘में मकबूल शेरवानी की कहानी लिखी है। इस उपन्यास को भारतीय टेलीविजन शो ‘मकबूल की वापसी’ में रूपांतरित किया, जो डीडी कश्मीर पर प्रसारित हुआ था।
दिया देशभक्ति का संदेश
मकबूल शेरवानी की जीवन-गाथा हमें यह सिखाती है कि देशभक्ति केवल सैनिकों तक सीमित नहीं होती। एक सामान्य युवक, बिना किसी सैन्य प्रशिक्षण या हथियार के, केवल अपनी सूझबूझ, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम से इतिहास की दिशा बदल सकता है। उनका बलिदान यह भी सिद्ध करता है कि कश्मीर की आत्मा सदा से भारत के साथ जुड़ी रही है, और वहाँ के लोगों ने समय-समय पर इस भावना को अपने बलिदान से प्रमाणित किया है। आज जब कश्मीर में शांति और विकास की बात होती है, तो मकबूल शेरवानी जैसे वीर सपूतों का स्मरण हमें यह याद दिलाता है कि यह धरती किन बलिदानों की नींव पर खड़ी है।
निष्कर्ष :
मकबूल शेरवानी भारत माँ के उन अनगिनत सच्चे सपूतों में से एक हैं, जिन्होंने बिना किसी अपेक्षा के अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए न्यौछावर कर दिया। बारामुला की गलियों में उनके साहस की गूँज आज भी सुनाई देती है, और श्रीनगर के आकाश में उतरने वाला हर भारतीय विमान मानो उनके बलिदान को श्रद्धांजलि देता प्रतीत होता है। उनकी वीरगाथा हर भारतीय, विशेषकर युवा पीढ़ी के लिए, यह प्रेरणा देती है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए बड़े हथियारों से अधिक बड़ा हृदय और दृढ़ संकल्प आवश्यक होता है। मकबूल शेरवानी भारत के इतिहास में सदैव एक अमर बलिदानी और सच्चे देशभक्त के रूप में स्मरण किए जाते रहेंगे।
महान देशभक्त मकबूल शेरवानी को कोटिशः नमन।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
