कविता

स्याह चरित्र दिखाये हो

स्याही तो चेहरे पर फेंक दी,
कालिख तो पोत दिए,
इसके सिवा तुम कर क्या सकते हो,
जातिवादी जलन और कुढ़न
गहने रहे हैं तुम्हारे बरसों से।
चेहरा तो धुल जाएगा,
लेकिन लोगों के दिलों में
तुम्हारे लिए बचा थोड़ा-सा सम्मान,
न बचेगा और न रहेगा।
तुमने समझा होगा
कि रंग पोत देने से
सच का चेहरा बदल जाएगा,
मगर सच की अपनी रोशनी होती है,
वह अँधेरों में भी
पहचान लिया जाता है।
स्याही के छींटों से
विचार नहीं मिटते,
कालिख के दागों से
इतिहास नहीं बदलता,
और किसी के चेहरे को
मैला कर देने से
अपना चरित्र उजला नहीं होता।
तुम्हारी नफरत
तुम्हारी पहचान बनेगी,
तुम्हारी कुंठा
तुम्हारा परिचय बनेगी,
और वक्त जब हिसाब लिखेगा,
तब चेहरे नहीं
चरित्र पढ़े जाएंगे।
याद रखना,
सम्मान माँगा नहीं जाता,
कर्मों से कमाया जाता है;
और जिसे तुमने
जाति के अहंकार में
ठुकराया है,
वही सच के साथ खड़ा होकर
तुम्हारे झूठ का पर्दाफाश करेगा।
चेहरा धुल जाएगा,
स्याही मिट जाएगी,
कालिख भी उतर जाएगी
मगर तुम्हारे हाथों से
जो विश्वास टूटा है,
उसका दाग
शायद कभी न मिट पाएगा।
क्योंकि कालिख चेहरे पर नहीं,
असल में चरित्र पर पोती गई है
और चरित्र का आईना
समय के सामने
कभी झूठ नहीं बोलता।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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