कुण्डली/छंद

कुण्डलिनी छंद

मन की  आँखें  खोलिए, और  लीजिए  ज्ञान।
इतना  भी  अच्छा  नहीं, मुफ्त  बाँटना  दान।।
मुफ्त बाँटना  दान, सुनो  मत  नाहक  सबकी।
निर्णय अंतिम आप, करो अब अपने मन की।।६९

आया है फिर से प्रलय, हम सब हुए अधीर।
जैसा चाहें  अब करें, निज  मन से  रघुवीर।।
जो  मन में  रघुवीर, आज विपदा का साया।
प्रलय  रुप  में  आज,  परीक्षा  लेने  आया।।७०

जैसे  हम  बढ़ते  गए,      बदल  गए  आधार।
सब कुछ तो बदला मगर, बदले नहीं विचार।।
बदले  नहीं  विचार,   समझता क्या  मैं  कैसे।
इसीलिए  तो  आज, सभी   हैं   मूरख  जैसे।।७१

करना है  यदि  साधना, करो  समर्पण  आप।
जब हो  मन में आस्था, नहीं  स्वार्थ  संताप।।
नहीं  स्वार्थ  संताप,   भावना  पावन  रखना।
तभी सुखद परिणाम, चाह ईश्वर मन करना।।७२

मंजर  ऐसा  देखना,    मन  को  देता  दर्द।
ऐसे  छूटे  कँपकँपी,   जैसे  भीषण  सर्द।।
जैसे भीषण सर्द, चुभाओ तुम मत खंजर।
नहीं चाहता विश्व, कभी अब ऐसा मंजर।।७३

माया  बंधन  में  फँसे,     होता  कैसे  ज्ञान।
और मानते कब भला, सभी यहाँ मेहमान।।
सभी  यहाँ  मेहमान, गए  पा  मानव काया।
इसी बात का दंभ, समझते  कब हैं  माया।।७४

जाने कैसा हो गया,  अपना आज समाज।
दर्द झेलती बेटियाँ,  गिरती उन पर गाज।।
गिरती उन पर गाज, हुए हम लोग सयाने।
कहें मित्र यमराज, भला  वो  कैसे जानें।।७५

हरियाली  चहुँओर अब,   स्वागत  करते लोग।
लगता  इनको  देखकर, सब हो  गये  निरोग।।
सब हो गए निरोग, दिखी अब मुख पर लाली।
रखिए  प्रभु जी  आप, सदा  ही ये  हरियाली।।७६

कैसे  हो  पहचान,    समस्या  सबसे भारी।
अपने  ही  अब  यार,  लगे  करने  गद्दारी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं सब बिल्कुल ऐसे।
यही  बड़ा  सवाल, आप  हम  जानें कैसे।।७७ 

किसके मन में क्या छिपा, बता रहे यमराज।
मूरख हमको मत कहो,  लुट जायेगी लाज।।
लुट  जायेगी  लाज,  यही  बस आगे  इसके।
चाह रहे गुरु मंत्र,  भाव यह मन में किसके।।७८

पानी चहुँदिश देखकर, जन मन  है  हैरान।  
दोषी भी हम आप है, इतना  तो है  ज्ञान।।
इतना  तो  है ज्ञान,  याद आती क्यों नानी।
दिखा रहा है रंग, आज हम सबको पानी।।७९

बढ़ता  ऐसे  ही  रहा, अगर  झूठ  पाखंड।
निश्चित  मानो  देश को, पड़े भोगना दंड।।
पड़े भोगना दंड, रही यदि  अपनी जडता।
बनेगा  ये  नासूर,    रोग  जायेगा  बढ़ता।।८०

इतना  भी  किसको  नहीं, हुआ अभी तक ज्ञान।
चलता इस संसार में,   विधि का अजब विधान।।
विधि का अजब विधान,  चाह तू रखता कितना।
जाना   खाली   हाथ,  भूल  मत  जाना  इतना।।८१

दिन दिन बढ़ता  जा रहा, आज  धरा  पर  पाप।
नाहक हम क्यों  कर रहे, सिर्फ दिखावा  जाप।।
सिर्फ दिखावा जाप, देखते सब पल छिन-छिन।
कहें  मित्र  यमराज, गिरे जाते  हम  दिन-दिन।।८२

कैसे होगा याद अब , बिना सोच के आज।
तुमको तो बस लग रहा, जैसे हो ये खाज।।
जैसे  हो  ये  खाज,   मानते  तुम  हो  ऐसे।
तब बतलाओ मित्र, याद फिर  होगा कैसे।।८३

मिलता बिन मेहनत नहीं,  खाली  सपने चार।    
समझेंगे  कब  लोग  ये, जीवन  का जो सार।।  
जीवन  का  जो सार, राह जो भी  हो दिखता।     
कहें  मित्र  यमराज,  बताओ  कैसे  मिलता।।८४

सत्ता  का  हथियार भी, बन  जाता  है अस्त्र।
भले  किसी के  हाथ में, होता  भारी  शस्त्र।।
होता  भारी  शस्त्र,   वही  तब  बनती  गत्ता।
कोशिश करके देख, दिखाती ताकत सत्ता।।८५

कैसे कहते आप हैं, करें नहीं हम फिक्र।
धीरे-धीरे घट रहा, चहुँदिश होता जिक्र।।
चहुँदिश होता जिक्र, सभी  रोते  हैं  ऐसे।
खोते जाते आज, कहें तो भी हम कैसे।।८६

भाता  सबको  है  नहीं, राजनीति  का  खेल।
सीधे-साधे  लोग  जो,   अक्सर  होते  फेल।।
अक्सर  होते  फेल,    नहीं  रख  पाते  नाता।
जो नहिं पाते झेल, भला क्यों उनको भाता।।८७

हरियाली   हर   ओर   का,     नारा   है  बेकार।
जब तक होंगी ख्वाहिशें,    करे सिर्फ सरकार।।
करें   सिर्फ   सरकार,    बनेगा   सदा   बवाली।
जन मानस की सोच, कथित चाहत हरियाली।।८८

लगती  नहीं  लगाम  है, चिंता  की  यह  बात।
भटक रहे हैं अब युवा, दिन हो या फिर रात।।
दिन हो या फिर रात, दाल इनकी नहिं गलती।
जाने क्या  जज़्बात, चोट भी  इनको  लगती।।८९

चलते-फिरते  हो  रहा, नाहक  ही  तकरार।
समझ नहीं आता हमें,     कैसे हो उपचार।।
कैसे   हो  उपचार,   रहेंगे  कब  तक  डरते।
होगा अंतिम वार,  प्यार  से  चलते-फिरते।।९०

सुख-सुविधा  की चाह में,  भटक रहा इंसान।
बनना   चाहे   देवता,    बन   जाता   हैवान।।
बन  जाता  हैवान,  नहीं दिखता है तब  दुख।
मुश्किल में परिवार, भूलना पड़ता सब सुख।।९१

जैसे   भूले    मृत्यु    को,  वैसे     शिष्टाचार।
मानव अब करता कहाँ, कोई  सोच विचार।।
कोई   सोच  विचार, आज  हम   होते   ऐसे।
नैया बिन  पतवार, भटकती बिल्कुल जैसे।।९२

*सुधीर श्रीवास्तव

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