कहानी

गंभीर बोझ  शादी,नहीं नहीं,,,

रात के दो बज रहे थे, लेकिन मंजूर साहब की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उनके सामने कॉपी का एक पन्ना खुला था, जिस पर पेंसिल से लिखी गई रकम (गिनती) बार-बार मिटाई और दोबारा लिखी जा रही थी। अगले महीने उनकी बड़ी बेटी, मरियम की शादी थी। घर में खुशी का माहौल होना चाहिए था, लेकिन मंजूर साहब के लिए यह खुशी एक ऐसे बोझ की तरह थी जो उनकी बूढ़ी हड्डियों को तोड़ रहा था।

“कितना हिसाब बना?” मंजूर साहब की पत्नी, तस्नीम ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा।

मंजूर साहब ने एक गहरी साँस भरी, चश्मा उतारा और काँपती आवाज़ में बोले, “तस्नीम… बीस लाख का दहेज माँगा है उन्होंने। कहते हैं लड़का सिविल इंजीनियर है, हमारी नाक का सवाल है। फिर छह लाख रुपये का बारात का खाना, लड़के के लिए महँगी घड़ी, सोने की अंगूठी… यही नहीं, मकलावे (शादी के बाद पहली विदाई) के दिन का खाना, वलीमे (रिसेप्शन) वाले दिन का नाश्ता, और तो और लड़की को रुख़सत (विदा) करते वक्त ससुराल वालों के तमाम छोटे-बड़े रिश्तेदारों के लिए सूट और उपहार!”

तस्नीम ने घबराकर कहा, “और वह जो बारात वापस जाते हुए साथ खाना पैक करके भेजने की शर्त है?”

“हाँ… वह भी!” मंजूर साहब का गला सूख गया। “बेटियों को कोई मुफ़्त में नहीं ले जाता तस्नीम! यहाँ तो ऐसा लगता है जैसे बेटी पैदा होना ही कोई जुर्म था, जिसकी सजा बाप पूरी ज़िंदगी भुगतता है।”

मरियम, जो दरवाजे के पीछे खड़ी यह बातें सुन रही थी, उसके दिल पर जैसे तीर-सा लग गया। वही मरियम जिसने अपनी मेहनत और क़ाबिलियत से यूनिवर्सिटी में टॉप किया था, आज महज़ एक “लड़की” होने के नाते अपने बाप की कर्ज़दार और मजबूर नज़र आ रही थी। उसके ज़हन में तस्वीर का वही सवाल गूँजने लगा जो अभी उसने एक तस्वीर देखी थी,,”बेटी है या सज़ा?”

अगली सुबह, मंजूर साहब ने अपना आख़िरी सहारा यानी वह छोटा-सा मकान गिरवी रखने का फ़ैसला कर लिया। जब वह कागज़ात पर दस्तख़त करने लगे, तो मरियम उनके सामने आकर खड़ी हो गई।

“अब्बू! रुक जाइए।” मरियम की आवाज़ में एक अजीब-सा दृढ़ संकल्प था।

“बेटा, तुम बीच में मत बोलो, यह बड़ों के मामले हैं।” मंजूर साहब ने प्यार से समझाना चाहा।

“नहीं अब्बू! यह मेरा मामला है,” मरियम ने बाप के बूढ़े और काँपते हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा। “अगर मेरी शादी के लिए आपको अपनी इज़्ज़त-ए-नफ़्स (स्वाभिमान), अपना घर और अपनी उम्र भर की जमा-पूँजी दाँव पर लगानी पड़े, तो मुझे ऐसी शादी नहीं चाहिए। अगर एक बेटी को विदा करने की क़ीमत इतनी संगीन है, तो यह रस्म नहीं बल्कि एक सज़ा है जो हमारा समाज एक बाप को देता है।”

मरियम ने उसी वक्त इस रिश्ते को ठुकरा दिया। शुरुआत में समाज और रिश्तेदारों ने तरह-तरह की बातें बनाईं, लेकिन मंजूर साहब का सिर फ़ख्र (गर्व) से ऊँचा हो गया।

कुछ समय बाद मरियम ने अपनी क़ाबिलियत के बल पर एक प्रतिष्ठित संस्थान में अच्छे पद पर नौकरी हासिल की और एक ऐसे सुशिक्षित और सभ्य इंसान से उसका रिश्ता तय हुआ, जिसके घर वालों ने दहेज, फ़िज़ूल की रस्मों और दिखावे को सख्त नापसंद किया।

मंजूर साहब ने उस दिन सुकून की साँस ली और मुस्कुराकर बोले, “बेटी सज़ा नहीं… बेटी तो रहमत (ईश्वर की कृपा) है, सज़ा तो वह नादान समाज है जो इस रहमत को बोझ बना देता है।”

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।