गीत/नवगीत

गीत

मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।
सच्चे मन की छाँव कहाँ है, किसको दर्द सुनाएँ।

1
चहरों पर मुस्कान सजी है,भीतर सूना गाँव।
अपनेपन की धूप बिकी है, छिनी सुनहरी छाँव।
मतलब की दुनियाँ में आखिर, किसको गले लगाएँ।
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।

2
सुख के साथी लाख मिलेंगे, दुख में कौन खड़ा है।
हरदमअपना कहने वाला, पल में खूब लड़ा है।
प्रेम जहाँ निष्काम रहा है, अंधियारा मिट जाए,
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।

3
धन-दौलत के मोल बिके जब, आशा और विश्वास  ।
सूख गई मन की फुलवारी, मुरझाया  मधुमास।
‘मृदुल’ नेह का बीज हृदय में, फिर से आज उगाएँ।
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल” 

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016