गीत
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।
सच्चे मन की छाँव कहाँ है, किसको दर्द सुनाएँ।
1
चहरों पर मुस्कान सजी है,भीतर सूना गाँव।
अपनेपन की धूप बिकी है, छिनी सुनहरी छाँव।
मतलब की दुनियाँ में आखिर, किसको गले लगाएँ।
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।
2
सुख के साथी लाख मिलेंगे, दुख में कौन खड़ा है।
हरदमअपना कहने वाला, पल में खूब लड़ा है।
प्रेम जहाँ निष्काम रहा है, अंधियारा मिट जाए,
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।
3
धन-दौलत के मोल बिके जब, आशा और विश्वास ।
सूख गई मन की फुलवारी, मुरझाया मधुमास।
‘मृदुल’ नेह का बीज हृदय में, फिर से आज उगाएँ।
मतलब के सब रिश्ते-नाते, कब तक बोझ उठाएँ।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
