हास्य काव्य
विधा : हास्य काव्य
शेष स्वरूप : पहेली शैली
सुबह उठते ही साथ में उठते,
रात को सोते ही साथ में सोते,
कभी-कभी रात में भी जगते,
हमें पता भी नहीं लगने देते!
देते हैं वे ही कभी घाव,
वही करते-कराते हैं लगाव,
उनके कारण भर जाते भंडार,
उन्हीं के कारण होता है अभाव!
उनमें होती मधु-सी मिठास,
कभी कड़वाहट कभी खटास,
रखना पड़ता उनमें विश्वास,
कभी वे ही तोड़ भी सकते विश्वास।
वे ही होते हैं अर्थ के साधक,
वे ही होते हैं अनर्थ के बाधक,
कभी-कभी होते वे निंदक,
वे ही होते हैं अद्भुत आराधक!
जिनके पास होते वे भी दुःखी
जिनके पास नहीं होते वे भी दुःखी
उसके बिना न किसी को चैन,
जानना चाहते हैं उसका नाम! वो हैं बैन!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
