अगर मैं आज़ादी के दौर में होती!
विधा- कहानी
शीर्षक- अगर मैं आज़ादी के दौर में होती!
अगर मैं आज़ादी के दौर में होती तो शायद जीवन कुछ और ही होता! वैसे मेरा जन्म तो आज़ादी के दौर में ही हुआ था, लेकिन वह आज़ादी के दौर का अंतिम चरण था. मैं एक साल की भी नहीं हुई थी कि आजादी मिल गई थी. मम्मी-पापा से जैसे हमने परतंत्रता के किस्से सुने थे, कैसे-कैसे जुल्म उन्होंने सहे थे, उस समय के बच्चे युवा-युवतियां कैसे देश की स्वाधीनता के लिए आतुर रहते थे और छोटा-छोटा सहयोग देते थे तो शायद मैं भी उन जैसे ही करती!
मैं स्वतंत्रता सेनानियों के साथ प्रभातफेरी में जाती, देशभक्ति के गीत गाती और लोगों में जागृति फैलाती. गाँव की महिलाओं को संगठित करती और उन्हें समझाती कि आज़ादी केवल पुरुषों की लड़ाई नहीं, बल्कि हर भारतीय का अधिकार है. यदि आवश्यकता पड़ती तो संदेश पहुँचाने, घायल क्रांतिकारियों की सहायता करने और आंदोलनकारियों के परिवारों का साथ देने से भी पीछे नहीं हटती. जिस देश की मिट्टी ने हमें जन्म दिया, उसके लिए थोड़ा कष्ट सहना भी सौभाग्य समझती. जिस प्रकार से हमें विभाजन का दंश झेलना पड़ा, शायद उसके सामने हमारा वह छोटा-सा सहयोग भी कम नहीं होता!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
