हास्य व्यंग्य – पुस्तक का लोकार्पण
कवि मुरारीलाल का एक बार और मन कर रहा है कि पुस्तक का लोकार्पण और हो जाता तो दिल को ठंडई मिल जाती । उम्र का अंतिम पड़ाव है। पूरी पूंजी लगाकर एक पुस्तक छपवाई। पांच छ:बार लोकार्पण हो गया है। अंतिम लालसा है कि वह आम जनमानस तक उनकी लेखनी पहुंचे।
साहित्यिक बिरादरी में उनका रौब है। उनकी एक प्रतिष्ठित मान सम्मान है। मान सम्मान की बड़ी चिंता रहती है। घरवाले तो कभी इजाजत ही नहीं दी। प्रतिभा तो उछल कूद करेगी ही। पुस्तक की पहली छपाई में पत्नी ने न छपाने का मल्हार राग गाया था। कवि ने कलेजे पर पत्थर रख कर पुस्तक छपाई थी।
छ: माह तो पत्नी मौन व्रत धारण कर लिया। परंतु कवि तो निराशाओं में भी आशा जगा देने की क्षमता रखता है। हार नहीं माने। पत्नी का रोना रोने को अनसुना करके कालजयी पुस्तक छपाई। कवि मुरारीलाल एक दार्शनिक विचारधारा के अप्रतिम कवि हैं। कवि का कहना है पत्नी तो जब तक जिंदा हूं तब तक है। पुस्तक तो मरणोपरांत भी हमें अपने करीब रखेगी।
अंतिम बार पुस्तक लोकार्पण की तैयारी जोरो के साथ शुरू। इसके पहले के लोकार्पण में अभी तक कोई पुस्तक नहीं बिकी। अंतिम उम्मीद अभी जिंदा है। कोई न कोई पुस्तक बिक ही जायेगी। लोकार्पण का अलग ही आनन्द होता है। जिंदगी का सबसे बड़ा सुख लोकार्पण में है।
लोकार्पण की तैयारी हो गयी। बड़े- बड़े कवियों को आमंत्रित किया गया था। एक विशाल लोकार्पण का आयोजन। देश विदेश की मीडिया। सभी चैनल। इतनी भीड़। लोकार्पण के समय पर इनकी धर्म पत्नी भी गुस्सा से भरी आ टपकी। आज या तो पुस्तक का लोकार्पण होगा या मेरा लोकार्पण होगा। मामला गंभीर होते देख कवि ने लोकार्पण स्थगित कर दिया। फिर लोकार्पण कभी जिंदगी में नहीं कराया।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
