क़ुदरत का अनूठा अजूबा, राइनोसिरोस हॉर्नबिल

सघन वर्षा वनों के ऊंचे कैनोपी (पेड़ों के ऊपरी हिस्से) में निवास करने वाला राइनोसिरोस हॉर्नबिल अपनी अद्भुत बनावट और विशिष्ट उपस्थिति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया,जैसे कि मलेशिया, इंडोनेशिया (सुमात्रा, जावा, बोर्नियो) और थाईलैंड के जंगलों में पाया जाने वाला यह पक्षी सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दोनों दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है।
अनोखी शारीरिक बनावट
इस पक्षी की सबसे बड़ी पहचान इसकी चोंच के ऊपर बनी सींग जैसी संरचना है, जिसे ‘कास्क’ कहा जाता है। यह सींग की तरह ऊपर की ओर मुड़ा होता है, जिसकी वजह से इसे ‘राइनोसिरोस’ (गेंडा) नाम मिला है।
कास्क की खासियत,,यह कास्क अंदर से खोखला होता है और पक्षी की आवाज़ को बढ़ाने के लिए एक अनुनादक का काम करता है। पक्षी का शरीर मुख्य रूप से काले रंग का होता है, जबकि पूंछ पर सफ़ेद और काले रंग का सुंदर संयोजन दिखाई देता है। इसकी चोंच और कास्क पर लाल, पीले और नारंगी रंग का मिश्रण होता है, जो पक्षी द्वारा अपनी प्रीन ग्रंथि (से निकलने वाले तेल को रगड़ने से बनता है।आंखें, नर पक्षी की आंखें लाल होती हैं, जबकि मादा की आंखें सफ़ेद या मोती जैसी होती हैं।
आहार और पारिस्थितिक भूमिका,,
राइनोसिरोस हॉर्नबिल मुख्य रूप से सर्वाहारी होते हैं। इनका मुख्य भोजन जंगली अंजीर ,और अन्य फ़ल हैं। इसके अलावा ये छोटे सरीसृप, कीड़े-मकोड़े और छोटे पक्षियों के अंडों का भी शिकार करते हैं। जंगल के पारिस्थितिक तंत्र में इनकी भूमिका ‘जंगल के किसानों’ जैसी है। ये फलों के बीजों को दूर-दूर तक फ़ैलाते हैं, जिससे नए पेड़ उगते हैं और वर्षावन घने और समृद्ध बने रहते हैं।
प्रजनन की अनोखी तकनीक,इनका घोंसला बनाने का तरीका बेहद अनोखा होता है। मादा पक्षी पेड़ के खोखले तने के भीतर बैठकर खुद को बंद कर लेती है और केवल एक पतली झिरी छोड़ती है। नर हॉर्नबिल पूरी प्रजनन अवधि के दौरान बाहर से उस झिरी के माध्यम से मादा और बच्चों को भोजन पहुंचाता है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब मादा बाहर आती है।
संरक्षण स्थिति,,,
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने इसे संकटापन्न श्रेणी में रखा है। वनों की अंधाधुंध कटाई और अवैध शिकार के कारण इनकी संख्या में भारी कमी आ रही है। मलेशिया के सारावाक राज्य में इसे राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा हासिल है और वहां की स्थानीय संस्कृति में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
