अँधेरा और उजाला
अँधियारे को कोसकर, कब तक बैठें मौन।
दीप जलाने की जगह, ढूँढ़ रहे हैं कौन॥
प्रकाश माँगें भीख में, हाथ लिए संसार।
अपने घर दीपक बुझा, करते जग उजियार॥
जो खुद रोशन हो नहीं, देते जग को ज्ञान।
बुझी हुई मशाल लेकर, करते बड़े बयान॥
सूरज सिर पर आ गया, फिर भी ढूँढ़ें छोर।
सच से आँखें फेरकर, कैसे पाएँ भोर॥
प्रकाश की बातें बहुत, भीतर घना अँधेर।
चेहरे पर उजला मुखौटा, मन में काला फेर॥
दीप जलाना छोड़कर, तम को देते दोष।
अपने भीतर झाँकना, लगता उनको रोष॥
जिनको जलना रास नहीं, उनको उजली चाह।
बिना तपे जो माँगते, कैसे पाएँ राह॥
दीपक जलता इसलिए, तम से करता युद्ध।
सुविधा में जो जी रहे, उनका कैसा शौर्य॥
इतिहासों में नाम वही, जिसने सहा प्रहार।
जो खुद जलकर राह दे, उसका जग आभार॥
रिश्तों में विश्वास की, जलती रहे मशाल।
स्वार्थों की आँधी चले, फिर भी रहे उजाल॥
जो खुद जलना सीखता, वही करे उजियार।
अपने हिस्से की धूप से, हर ले रात अपार॥
अँधियारा चाहे घना, दीपक हार न मान।
छोटी-सी इक लौ करे, रोशन सारा जहान॥
प्रकाश प्रतीक्षा से नहीं, होता है निर्माण।
जो खुद दीपक बन गया, उसका ऊँचा मान॥
अँधियारे से मत डरो, दीप बनो हर बार।
एक किरण ही कर सके, तम का अंत अपार॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
