अंतर आलोकित हो जाए प्रभु
विधा- कविता
शीर्षक- अंतर आलोकित हो जाए प्रभु
हे शिव शंकर प्रभु आए हैं तेरे साधक तेरे द्वार,
दे दर्शन करिए निज आराधक पर उपकार।
तेरी भक्ति में मिलती है मन को शांति अपार,
तेरे अनुरक्ति कर सकती भवसागर से पार।
भगवन आस्था से जो भी तेरी शरण में आया,
उसने निष्ठा से अपना जीवन धन्य बनाया।
मुक्ति पाने का मनोरथ आप ही पूर्ण करते,
चौरासी से छुटकारा दिलाते सब संकट हरते।
प्रेम सुधा की धार बहाते आप ही निर्मल मन में,
पूजा करने की शक्ति भी आप ही देते हो तन में।
संकट भी मुस्कुरा उठते आपकी कृपा से भगवन,
साहस बने पतवार जब हो तेरे अनुराग का आचमन।
सत्पथ पर चलने के देना प्रभु ऐसे सुभग संस्कार,
अंतर आलोकित हो जाए प्रभु, करूं सबका सत्कार।
कटुता, छल, अहंकार से देना निर्वाण दाता दयालु,
आठों याम तेरा सिमरन, सेवा भावना देना कृपालु।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
