कविता

अभिलाषा है यह मेरी

विधा- कविता
शीर्षक- अभिलाषा है यह मेरी

सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय कर्म हों,
सत्य-अहिंसा-मधुर वचन, सुधर्म हों,
हर्षित हों सबके मन, हो देश का हित,
अभिलाषा है लुप्त हों समस्त विकर्म-दुष्कर्म।

परहित सरिस धर्म नहिं दूजा, धर्म निभता रहे,
परपीड़ा सम नहिं कोई पाप, इससे मन दूर रहे,
इंसान हूं, इंसान बनूँ, अभिलाषा है यह मेरी,
तमस की जगह उजास भर सकूँ, न हो देरी।

कामनाएँ कम रखूँ, सेवा निःस्वार्थ हो,
सत्पथ पर बढ़ती रहूं, मन में विश्वास हो,
यथायोग्य मान-सम्मान देती रहूं सदा,
सहायक बन सकूँ, सिद्ध परमार्थ हो।

सहज-सरल सुन्दर-सुदृढ़, सद्भाव हो,
शीतल-निर्मल-अविचल स्वभाव हो,
बुजुर्गों का सम्मान, उद्वस अभिमान,
स्नेह-प्रेम में आने न पाए अभाव हो।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244