ग़ज़ल
दुआ पे शाह की आमीन कहना पड़ता है
बेवकूफों को भी जहीन कहना पड़ता है
इसलिए कभी दरबार नहीं जाता मैं
हर जुमले पे आफ़रीन कहना पड़ता है
अमीर ए शहर के घर रहता है जो पिंजरे में
उस तोते को भी शाहीन कहना पड़ता है
किया है वादा जो हाकिम ने वो निभाएगा
भले खुद को न हो यकीन कहना पड़ता है
मुझे ये बात नापसंद है मुशायरे की
हर ग़ज़ल को बेहतरीन कहना पड़ता है
— भरत मल्होत्रा
