दो जून (समय) की रोटी
विधा- कविता
शीर्षक- दो जून (समय) की रोटी
दो जून की रोटी के जुगाड़ में,
महज मशीन बन गया आदमी,
इंसानियत कर दी दरकिनार,
जुगाड़ में ही खो गया आदमी!
दो जून की रोटी जुटाते गुजारी उम्र,
संतुष्टि-तृप्ति हो न सकी फिर भी!
चार पहर की खुशियां खा गयी,
मिल न सकी वो ढंग से फिर भी!
साथ बैठ होती थी जो चंद बातें,
वो मीठी लड़ाई मन की खो गई,
हाय! नून मिर्च की फर्माइश में,
जीवन की चंचलता ही खो गई!
दो जून की रोटी के जुगाड़ में,
शाम की रंगीनियां खो गईं,
कमाने लगे हैं जीने के लिए,
जीने की वजहें ही खो गईं।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
