कविता

दो जून (समय) की रोटी

विधा- कविता
शीर्षक- दो जून (समय) की रोटी

दो जून की रोटी के जुगाड़ में,
महज मशीन बन गया आदमी,
इंसानियत कर दी दरकिनार,
जुगाड़ में ही खो गया आदमी!

दो जून की रोटी जुटाते गुजारी उम्र,
संतुष्टि-तृप्ति हो न सकी फिर भी!
चार पहर की खुशियां खा गयी,
मिल न सकी वो ढंग से फिर भी!

साथ बैठ होती थी जो चंद बातें,
वो मीठी लड़ाई मन की खो गई,
हाय! नून मिर्च की फर्माइश में,
जीवन की चंचलता ही खो गई!

दो जून की रोटी के जुगाड़ में,
शाम की रंगीनियां खो गईं,
कमाने लगे हैं जीने के लिए,
जीने की वजहें ही खो गईं।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244