ग़ज़ल
आइना हूँ, सामने मेरे सँभल कर आ ज़रा
सिर्फ़ सूरत ही नहीं सीरत बदल कर आ ज़रा
इस अना के खोल से बाहर निकल आया हूँ मैं
तू भी अपनी ज़ात से बाहर निकल कर आ ज़रा
देख तो महवे-सफ़र कैसी हैं ये दुश्वारियाँ
ऐ मेरी मंज़िल! मेरी जानिब तू चल कर आ ज़रा
आज तेरी ज़ात के असरार सब खुल जायेंगे
आइने में अक्स की मानिंद ढल कर आ ज़रा
शे’रगोई में असर पैदा जो करना है ‘अजय’
शायरी में ज़ाविये अपने बदल कर आ ज़रा
— अजय ‘अज्ञात’
