गजल
जाग के रातों को नीर बहाते क्यों हो।
आप लिख कर उसका नाम मिटाते क्यों हो।।
बात दिल की कह दो,कब तक शरमाओगे।।
प्रेम करते हो तो प्रेम छिपाते क्यों हो।।
प्यार में दोनों को ही झुकना पड़ता है।
आप ही उसको हर बार मनाते क्यों हो।।
जब तुम्हें गम से उसके कोई सरोकार नहीं।
फिर यह झूठी हमदर्दी दिखाते क्यों हो।।
वो तुम्हें कुचलने की करता है साजिश।
फेंक कर जो दे सिक्के तुम उठाते क्यों हो।।
पीठ में खंजर क्यों भोंक दिया है तुमने।
दोस्ती में छल का जहर मिलाते क्यों हो।।
— शालिनी शर्मा
