ग़ज़ल
दर्दों से अपना वास्ता बरसों तलक़ रहा,
किस्मत में एक हादसा बरसों तलक़ रहा।
शीशे चढ़े थे झूठ के आंखों पे सैकड़ों,
दिल में तो सच का आईना बरसों तलक रहा।
रहने को बड़े पास थे दुनिया के सामने,
पर दरमियां इक फ़ासला बरसों तलक़ रहा।
यूं तो हमारा इश्क़ था दो पल का ही मगर,
लोगों में उसका तज़किरा बरसों तलक़ रहा।
पिछले दिनों शुरू हुआ लिखने के नाम पर,
ग़ज़लों का एक सिलसिला बरसों तलक़ रहा।
ताउम्र फ़रामोश रहा ये जहां मगर,
जय के लबों पे शुक्रिया बरसों तलक़ रहा।
— जयकृष्ण चांडक ‘जय’
