गजल
चंद सिक्कों के लिए आदमी कितना बेईमान हो गया
महल के लिए झोंपड़ी ढाह दी कितना तंगदिल इंसान हो गया।।
लेकर मजहब का ठेका उठा ली बंदूकें ।
कुछ भटके लोग साथ चले तो जैसे भगवान हो गया ।।
बमों के धमाकों से मिट सकता है धरा का अस्तित्व।
इस बात से आदमी कितना अनजान हो गया।।
लाशों के ढेर देखकर भी आज रोती नहीं आंखें जिसकी।
दिल – दिमाग का यह पिंजरा कितना बेजान हो गया।।
आजाद होकर उड़ न सकें परिंदों की तरह दर्द।
सरहदें बांधना ही आदमी का ईमान हो गया।।
— अशोक दर्द
