लघुकथा

तलाश: एक नई सुबह की

42 वर्षीय राघव अपनी कार की स्टीयरिंग पर सिर रखे फुटपाथ के किनारे खड़े थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और उनके अंदर आंसुओं का सैलाब। जिस स्टार्टअप कंपनी को उन्होंने पांच साल दिन-रात एक करके खड़ा किया था, आज मंदी के दौर में उनके पार्टनर्स ने उन्हें ही धोखा देकर कंपनी से बाहर निकाल दिया था। राघव के लिए यह सिर्फ एक नौकरी या बिज़नेस का जाना नहीं था, यह उनकी पहचान का अंत था। उन्हें लग रहा था कि उनकी जिंदगी का सफर यहीं खत्म हो गया।

तभी खिड़की पर थपथपाहट हुई। राघव ने शीशा थोड़ा नीचे किया। बाहर एक 20 या 22 साल का लड़का भीगा हुआ खड़ा था, उसके हाथ में फटे हुए जूतों का एक थैला था और चेहरे पर एक अजीब सी बेफ़िक्री। “साहब, थोड़ा आगे छोड़ दोगे? मेरी चप्पल टूट गई है और इस बारिश में मोची की दुकान भी बंद है,” लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा।

राघव ने बिना कुछ सोचे उसे अंदर बुला लिया। गाड़ी आगे बढ़ी। राघव की मायूसी भांपकर उस लड़के ने पूछा, “साहब, इतने बड़े आदमी हो, इतनी बड़ी गाड़ी है, फिर भी चेहरा उतरा हुआ है? कोई बहुत बड़ा नुकसान हो गया क्या?”

राघव ने एक ठंडी सांस ली और कहा, “सब कुछ खत्म हो गया छोटे। मेरा करियर, मेरी बनाई कंपनी, मेरी पहचान… सब कुछ एक झटके में मिट गया। अब आगे कुछ बचा ही नहीं।”

लड़का हँस पड़ा। राघव को उसकी हँसी पर थोड़ा गुस्सा आया, “तुम हँस रहे हो?”

लड़के ने अपने थैले से वो फटा हुआ जूता निकाला और बोला, “साहब, इस जूते को देखो। इसका सोल पूरी तरह घिस चुका है, सिलाई उखड़ गई है। इसका चलना अब बंद हो गया। यानी इस जूते का ‘अंत’ हो गया है, सही न?”

राघव ने अजीब नज़रों से देखा, “हाँ, तो?”

लड़के ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “लेकिन साहब, जब तक मैं इस फटे हुए जूते को अपने पैर से उतारकर फेंक नहीं दूँगा, तब तक मैं बाज़ार जाकर नया जूता खरीदने की बात सोचूँगा भी नहीं। जब तक पुराना हटेगा नहीं, नए के लिए जगह कैसे बनेगी? आपकी कंपनी छूट गई, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप खत्म हो गए। इसका मतलब यह है कि अब आपके पैर खाली हैं, ताकि आप एक नया और बेहतर रास्ता चुन सकें।”

“जब तक पुराना हटेगा नहीं, नए के लिए जगह कैसे बनेगी?” यह साधारण सी बात राघव के दिमाग में बिजली की तरह कौंधी। वह लड़का तो अपनी मंज़िल पर उतर गया, लेकिन राघव को एक बहुत बड़ी सीख दे गया। राघव ने महसूस किया कि वह एक बंद हो चुके दरवाज़े को पीट रहे थे, जबकि उनके पीछे एक पूरा खुला आसमान था।

अगले ही दिन, राघव ने अपनी डायरी उठाई। इस बार उन्होंने किसी और के साथ पार्टनरशिप करने के बजाय, अपने दम पर काम शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने अपने घर के एक छोटे से कमरे से एक ‘कंसल्टेंसी फर्म’ की शुरुआत की।

 *पहला महीना: कोई मुवक्किल नहीं आया, लेकिन राघव ने हिम्मत नहीं हारी। वह रोज़ सुबह ९ बजे तैयार होकर अपने उस छोटे से कमरे में बैठते।

 *तीसरा महीना: उनका पहला क्लाइंट आया, जो राघव के पुराने अनुभव और ईमानदारी से बेहद प्रभावित हुआ।

 *एक साल बाद: राघव की नई कंपनी में अब १० लोग काम कर रहे थे। यह कंपनी भले ही पुरानी जितनी बड़ी नहीं थी, लेकिन यहाँ कोई धोखा नहीं था, कोई राजनीति नहीं थी। यहाँ सिर्फ सुकून और आत्मसम्मान था।

एक शाम, जब राघव अपनी नई कंपनी के केबिन में बैठे थे, तभी बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गई। उन्होंने अपनी खिड़की से नीचे सड़क पर देखा। एक आदमी हाथ में नया जूता पहने तेजी से आगे बढ़ रहा था।

राघव मुस्कुराए, उन्होंने अपनी टेबल पर रखे पेन को उठाया और अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा: “धोखा, असफलता या विदाई… यह जिंदगी का अंत नहीं है। यह तो कुदरत का इशारा है कि अब पुराने जूते उतारो, क्योंकि सामने एक नया और खूबसूरत रास्ता तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

— धर्मेन्द्र शर्मा ‘अदम्य’

धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा - परिचय जन्म स्थान: ग्राम रानपुर (अंबाह, मुरैना, मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती सोमवती जी और श्री कृष्ण शर्मा शिक्षा: बी.एससी. नर्सिंग, एम.एससी. (रसायन विज्ञान), डी.सी.ए. और वर्तमान में एम.एससी. (जूलॉजी) में अध्ययनरत। प्रमुख रचनाएँ: काव्य-संग्रह: ‘ख़ामोशी के अल्फ़ाज़’ उपन्यास एवं कहानियाँ: ‘भाई फिर बटवारा क्यों?’, ‘वैश्या ही चरित्रहीन क्यों?’, ‘भाई मुझे तुम पर भरोसा है’, ‘4 साल 230 दिन’, और ‘अधूरी मोहब्बत की दास्तान’। विशेषता: ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। M= 90391 04716