कविता

प्रेम-तरु

विधा- कविता
शीर्षक- प्रेम-तरु

प्रेम ही रिश्तों को आपस में जोड़ता है,
प्रेम ही एक-दूजे को इष्ट-मित्र बनाता है,
प्रेम कोई शब्द नहीं, है परस्पर विश्वास,
विश्वास ही तब प्रेम -तरु बन जाता है।

विश्वास के जल से जब रिश्ते सींचे जाएं,
दूरियां भी विश्वास को डगमगाने न पाएं,
दो धड़कनों से हर मौसम फिर मधुमास है,
दुनिया के धोखे भी जड़ों को उखाड़ न पाएं!

मधुर-मृदुल एहसास से फले प्रेम-तरु का मूल,
सिंचित हो जब प्रणय-भाव से, खिलें प्रेम के फूल,
स्वार्थ जहाँ मुरझा जाए, अपनापन खिलने लगे,
नहीं टिकने पाती वहाँ कभी भी एक-दूजे की भूल!

समर्पण, सम्मान और धैर्य का जल हो,
प्रेम जीवनभर फलता-फूलता फल है,
प्रेम है जीवन का सहज-सौम्य व्यवहार,
सच्चे मन की हरियाली से सुहाना हर पल है।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244