प्रेम-तरु
विधा- कविता
शीर्षक- प्रेम-तरु
प्रेम ही रिश्तों को आपस में जोड़ता है,
प्रेम ही एक-दूजे को इष्ट-मित्र बनाता है,
प्रेम कोई शब्द नहीं, है परस्पर विश्वास,
विश्वास ही तब प्रेम -तरु बन जाता है।
विश्वास के जल से जब रिश्ते सींचे जाएं,
दूरियां भी विश्वास को डगमगाने न पाएं,
दो धड़कनों से हर मौसम फिर मधुमास है,
दुनिया के धोखे भी जड़ों को उखाड़ न पाएं!
मधुर-मृदुल एहसास से फले प्रेम-तरु का मूल,
सिंचित हो जब प्रणय-भाव से, खिलें प्रेम के फूल,
स्वार्थ जहाँ मुरझा जाए, अपनापन खिलने लगे,
नहीं टिकने पाती वहाँ कभी भी एक-दूजे की भूल!
समर्पण, सम्मान और धैर्य का जल हो,
प्रेम जीवनभर फलता-फूलता फल है,
प्रेम है जीवन का सहज-सौम्य व्यवहार,
सच्चे मन की हरियाली से सुहाना हर पल है।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
