कविता

शहर-शहर जल का कहर

विधा- कविता
शीर्षक- शहर-शहर जल का कहर

शहर-शहर जल का कहर,
तबाही का मंजर है,
बाढ़ पानी की हो या जनसख्या की,
तबाही का खंजर है।

घन घोर गरजते नभ में बादल,
कंठ धरा का भर आया,
जन-जन का विकराल हाल है,
पत्ता-पत्ता थर्राया!

नदियाँ उफनाईं, गलियाँ डूबीं,
राहें सारी टूट गईं,
जाने कब यह कहर थमेगा,
सारी उम्मीदें छूट गईं।

प्रकृति से छेड़छाड़ कर पाया,
यह परिणाम है दुश्वारी,
पेड़ कटते गए तो बढ़ती गई,
बाढ़ की दुर्घर्ष लाचारी।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244