शहर-शहर जल का कहर
विधा- कविता
शीर्षक- शहर-शहर जल का कहर
शहर-शहर जल का कहर,
तबाही का मंजर है,
बाढ़ पानी की हो या जनसख्या की,
तबाही का खंजर है।
घन घोर गरजते नभ में बादल,
कंठ धरा का भर आया,
जन-जन का विकराल हाल है,
पत्ता-पत्ता थर्राया!
नदियाँ उफनाईं, गलियाँ डूबीं,
राहें सारी टूट गईं,
जाने कब यह कहर थमेगा,
सारी उम्मीदें छूट गईं।
प्रकृति से छेड़छाड़ कर पाया,
यह परिणाम है दुश्वारी,
पेड़ कटते गए तो बढ़ती गई,
बाढ़ की दुर्घर्ष लाचारी।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
