कविता

गिरगिट जैसे रंग बदलते नेता

विधा- कविता
शीर्षक- गिरगिट जैसे रंग बदलते नेता

रंग बदलते गिरगिट जैसे,
उनको नेता कहते हैं,
नहीं दिखाते असली चेहरा,
मुखौटा पहने रहते हैं।

वादे करते हजारों-लाखों,
पूरा एक न करते हैं,
याद दिलाए जाएं वादे,
साफ-साफ वे मुकरते हैं।

भाषण पर राशन नहीं लागू,
जनता को बहलाते हैं,
संकट देखकर सो जाते जो,
नेता वे कहलाते हैं।

चिकनी-चुपड़ी मिलती इनको,
जनता भूखी मरे तो क्या!
नेतागिरी बनी रहे जैसे-तैसे,
देश से इनको लेना क्या!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244