गिरगिट जैसे रंग बदलते नेता
विधा- कविता
शीर्षक- गिरगिट जैसे रंग बदलते नेता
रंग बदलते गिरगिट जैसे,
उनको नेता कहते हैं,
नहीं दिखाते असली चेहरा,
मुखौटा पहने रहते हैं।
वादे करते हजारों-लाखों,
पूरा एक न करते हैं,
याद दिलाए जाएं वादे,
साफ-साफ वे मुकरते हैं।
भाषण पर राशन नहीं लागू,
जनता को बहलाते हैं,
संकट देखकर सो जाते जो,
नेता वे कहलाते हैं।
चिकनी-चुपड़ी मिलती इनको,
जनता भूखी मरे तो क्या!
नेतागिरी बनी रहे जैसे-तैसे,
देश से इनको लेना क्या!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
