मृदु मुस्कान
विधा- कविता
शीर्षक- मृदु मुस्कान
जाने कैसे बदल गया इतिहास,
खत्म हो रही रिश्तों की मिठास,
बदल गए अपने ही वे अब तो,
जिनसे थी अपनेपन की आस!
टिके हुए अब बस स्वार्थ पे रिश्ते,
स्वार्थ पूरा तो पूरे हुए रिश्ते,
कैसे आए मृदु मुस्कान लबों पर,
मेल से जब छूछे हों रिश्ते!
अहंकार हो गया प्रधान है,
बड़े बुजुर्गों का रहा न मान है,
छोटे भी हैं प्यार को तरसते,
बस स्क्रीन पे सबका ध्यान है।
बिखर गई खुशबू रिश्तों की,
बस अब है चिंता किश्तों की,
टूट रहे नफरत से रिश्ते,
आस नहीं अब है फरिश्तों की!
जीने का सलीका सिखा प्रभु,
हर हाल में मुस्काना सिखा प्रभु,
खूबसूरत सुबह के लिए धन्यवाद है,
रिश्तों को निभाना सिखा प्रभु।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
