फुहार और मल्हार
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
सावन वर आयो,
प्रकृति वधू सज गई ।
आई बारात मेरे द्वार ।
नाचो सखी गाओ मल्हार ।
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
सविता सखी पीली धूप,
बदन पे मल गई
देखो हल्दी का रस्मोचार ।
नाचो सखी गाओ मल्हार ।
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
मेहंदी का पौधा ,
भर-भर लाया पत्तियाँ
मेहंदी रचाई संग प्यार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
अग्नि के फेरे लिए
उमस कुछ बढ़ गई
जीवन में छाई बहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
प्रकृति रानी
सावन संग झूम उठी
हर्षित बदन, तन
पुलकित सभी का मन
पालकी उठाओ कहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
पिता आसमान
फूट-फूट रो पड़े ।
माँ धरती
है करत गुहार,
नाचो सखी गाओ मल्हार
बरखा की पड़त फुहार
नाचो सखी गाओ मल्हार ।।
— बृजबाला दौलतानी, आगरा
