लघुकथा

लघु कथा : बस्ता

सवा दो साल की बिटिया बैंककर्मी माँ की निगाह में स्कूल जाने योग्य हो गई थी। माँ ने उसे घर के निकट के प्लेग्रुप स्कूल में भरती करवा दिया। बच्ची छोटी थी। स्कूल के अन्य बच्चों के साथ साहचर्य न बिठा पाती। फलस्वरूप, कक्षा की अध्यापिका प्रायः उसे आया के साथ बाहर टहलने भेज देती। आया उसे संभालती और अपनी भाषा में उसे कुछ ना कुछ बताती रहती। तीसरा दिन, आज माँ का अवकाश था। बच्ची घर आई, माँ से बोली “बस्ता लईले, खाना दै दे।”
माँ हैरान थी ! “यह क्या? यह क्या बोल रही हो तुम? बस्ता? यह बस्ता क्या है? “

बिटिया ने अपने स्कूल के बैग को माँ के हाथ में दे दिया और बोली “यह है बस्ता।”

माँ अवाक थी ‘अरे, मैं तुम्हें कॉन्वेंट प्ले ग्रुप में भेज रही हूँ ताकि तुम कुछ अच्छी भाषा सीखो। यह बस्ता लईले, खाना दइदे। नहीं, नहीं ! यह नहीं हो पाएगा।’

दूसरे दिन वह प्रधानाध्यापिका के समक्ष थीं और शिकायतों का पिटारा खोल, पूरी फीस वापसी की माँग के साथ उन्होंने अपनी बच्ची का नाम स्कूल से कटवा लिया था। अब वे पुनः किसी अच्छे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल की तलाश में थीं। जहाँ बस्ते नहीं, स्कूल बैग ले जाए जाते हों।

— बृज बाला दौलतानी