कविता

सड़क का मंजर और खामोश तमाशा

तपती सड़क पर लहू से सनी एक आह है,
दर्द में डूबी हुई वो टूटती सी साँस है।
तड़प रहा है जिस्म कोई मौत के करीब,
मदद को तरसता वो बेबस गरीब।
मगर तमाशा देखिए इस दौर-ए-खास का,
दिल पत्थर हो गए हर इक इंसान का।
लहू की धार पे अपनों की भीड़ है,
मगर हाथों में सबके लोहे की भीड़ है।
दर्द की चीख पर किसी को तरस नहीं आता,
फरिश्ता बनकर कोई शख्स नहीं आता।
सबकी उंगलियों में फंसी बस स्क्रीन है,
देखिये आज की ये कितनी दर्दनाक सीन है।
ज़ख्म पे मरहम लगाने कोई आगे न आया,
सबने बस वीडियो बनाने का फर्ज निभाया।
तड़पते इन्सान का दर्द कोई देख न सका,
रिल्स और लाइक से किसी का पेट न भरा।
कोई गिरा है तो उठाओ उसे यारो,
इस वहशीपन और तमाशे को अब तो रोको।
ज़िन्दगी बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन से बढ़कर कोई कर्म नहीं।
सोचो अगर उस जगह तुम्हारा कोई अपना होता,
तड़पता वो भी यूँही और सारा जहाँ सोता।
पत्थर दिल से अब तो इंसान बन जाओ,
वीडियो छोड़कर किसी की जान बचाओ!

— धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा - परिचय जन्म स्थान: ग्राम रानपुर (अंबाह, मुरैना, मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती सोमवती जी और श्री कृष्ण शर्मा शिक्षा: बी.एससी. नर्सिंग, एम.एससी. (रसायन विज्ञान), डी.सी.ए. और वर्तमान में एम.एससी. (जूलॉजी) में अध्ययनरत। प्रमुख रचनाएँ: काव्य-संग्रह: ‘ख़ामोशी के अल्फ़ाज़’ उपन्यास एवं कहानियाँ: ‘भाई फिर बटवारा क्यों?’, ‘वैश्या ही चरित्रहीन क्यों?’, ‘भाई मुझे तुम पर भरोसा है’, ‘4 साल 230 दिन’, और ‘अधूरी मोहब्बत की दास्तान’। विशेषता: ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। M= 90391 04716