हरियाली की बहार
विधा- कविता
शीर्षक- हरियाली की बहार
सावन हो-न-हो मेरे घर हर पल सावन है,
हरियाली की बहार है,
हरियाली का गलीचा, हरियाली की दीवार है,
बसा इसमें प्यार-ही-प्यार है।
बड़े प्यार से सींचती हूँ मैं अपनी बगिया को,
यही सुखद संसार है,
इंद्रधनुष उतर आता है मानो जमीं पर जब,
कलियां खिलकर फूल बनती हैं।
खिड़की से निहारूं तो हर पल यह हरियाली,
देती है मन को सुकून,
गुनगुनाते हैं भौंरे, गाती हैं तितलियां जिन्हें है,
फूलों के रसपान का जुनून।
यह हरियाली ही है मेरे घर का अनुपम श्रृंगार,
सबको ही लुभाती है,
मैं गाऊं कोई मनभावन-सुरीला गीत नया,
हरियाली भी संग-साथ गाती है।
(मेरी फोटोग्राफी पर मेरी कविता)
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
