वैराग्य के भागी
विधा- कविता
शीर्षक- वैराग्य के भागी
छोटे-बड़े और खोटे-खरे का
भाव न जिसके मन में आए,
खाली-भरा या ऊंचा-नीचा,
जिसकी नजर को ना भरमाए।
उत्कृष्ट और निकृष्ट की कल्पना,
किंचित भी नहीं जो करता है,
सुख-दुःख में और तमस-विभा में,
समभावी जो रह सकता है।
दिवस-रैन और ऊंच-नीच का,
जिसको तनिक आभास न हो,
अनुरक्ति का और विरक्ति का,
जिसकी दृष्टि में निवास न हो।
अहं भाव से जो रीता हो,
आना-जाना सम जिसको हो,
मिलना और फिर मिलके बिछड़ना,
एक बराबर जिसको हो।
जो न कहे खुद को वैरागी,
उसको असल वैराग्य है होता,
सुख में भी जो तनिक न फूले,
दुःख का भान न उसको होता।
तपन-उजाला बांटे बराबर,
सूरज है सच्चा वैरागी,
समदृष्टा हैं धरती-अंबर,
सर्वथा सच्चे वे वैरागी।
जल-वायु और वृक्ष-लताएं
ये सब हैं सच्चे वैरागी,
प्रकृति के अनमोल नगीने,
ये सब हैं वैराग्य के भागी,
ये सब हैं वैराग्य के भागी,
ये सब हैं वैराग्य के भागी।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
