कविता

कविता

हम वृद्धों की है यही कहानी
नज़र मैं बुढ़ापा दिल मैं जवानी
बाल हो गए सफ़ेद
कर के उनको काले
पिल पिले मुहँ में लगाकर नई बत्तीसी
घूमते हैं इस उम्र में भी बन ठन के
दिल में लिए एक उम्मीद
जाते हैं जिम में
करते हैं वेट लिफ्टिंग
घर आकर करवाते हैं सिकाई
अपनी उसी बूढी होती मेहरुआ से
कहती है मेहरुआ
अब किसको दिखानी है तुमको यह जवानी
बूढ़े हो गए हो माथा भी सटक रहा है
घर बैठो
कहीं गिर गए
तो तोड़ लाओगे हाथ पैर
सब भूल जाओगे
बिस्तर पर पसर जाओगे
आने जाने को हो जाओगे मोहताज़
फिर गुनगुनाते रहना मन में
मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू

— ब्रजेश गुप्ता

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020