अब और क्या चाहती है तू?
अब बता भी दे जरा,
और क्या चाहती है तू मुझसे,
तंग आ चुका हूं तुझसे,
विवाहोपरांत मेरी पत्नी,
क्लोज नहीं हो पायी उतनी,
उतना दखलंदाजी कर रही है मेरे मन मंदर में,
किनारे पाने के लिए मार रहा हूं हाथ पांव
डूबता जा रहा हूं तुझ जैसे समंदर में,
क्या जादूगरनी है तू,
क्या मेरे पल पल की विवरणी है तू,
रील्स की आभासी दुनिया में,
कैसा यह जाल बिछाया है,
बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे,
पर हर शख्स यहां पर पराया है,
बच्चे की किलकारी छूटी,
रिश्तों की वो गर्माहट टूटी,
तेरी नीली रोशनी के चक्कर में,
अपनों की हर शिकायत रूठी,
तूने फुसफुसाकर कानों में,
अपनों की आवाज को छीन लिया,
नोटिफिकेशन के इस दलदल ने,
मेरा चैन,मेरा हर दिन लिया,
अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन,
मुझे मेरी दुनिया वापस दे,
जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे हों,
मुझे वो हंसता हुआ आंगन दे,
छोड़ के तुझको अब जीना है,
अपनों को गले से लगाना है,
इस आभासी मायाजाल से उठकर,
मुझे फिर से इंसान बन जाना है।
— राजेन्द्र लाहिरी
